Thursday, January 2, 2014

ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था

अपूर्वानंद


ऐसा तो गुजरात में भी नहीं हुआ था! हाँ ! हमें 2002 की गर्मियां ज़रूर याद हैं, मस्जिदों में चल रही पनाहगाह की याद है, याद हैं गम से खामोश और समझदार आँखें जो हमें देख रही थीं जो उनका दुःख बँटाने आए थे वहाँ, कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ वक्त गुजारने, फिर जो अपने घरों को लौट जाने को थे क्योंकि हमारे घर थे जहां हम लौट सकते थे, घर जो आपका इंतज़ार जितना करता है उससे कहीं ज़्यादा दिन-हफ्ते उससे बाहर गुजारते हुए आप उसका करते हैं. वे आँखें जानती थीं कि हमारे घर हैं लौटने को और उनके नहीं हैं. वे अशफाक, सायरा, शकीला होने की वजह से बार-बार घर खोजने को नए, सिरे से उन्हें बसाने को मजबूर हैं, कि उनको  और उनकी आगे की पीढ़ियों को इसका इत्मीनान दिलाने में यह धर्मनिरपेक्ष भारत,यह हिन्दुस्तान लाचार है. जिसकी हस्ती कभी नहीं मिटती, उस हिन्दुस्तान को बनाने वालों में कई को ज़रूर एक ज़िंदगी में कई जिंदगियां गढ़नी पड़ती हैं. एक घर के बाद कई घर बसाने पड़ते हैं.
फिर बारिश आई जिसका अहमदाबाद और पूरे गुजरात को दो साल से बेकरारी से इंतज़ार था. और लोगों को वे गीत याद आए होंगे जो बारिश के स्वागत में गाए जाते हैं. दूसरी ओर, प्लास्टिक की पन्नियों से बनीं छतों ने बेचारगी और लाचारी से अपने नीचे सिकुड़े लोगों से जैसे माफी मांगी: उनमें कूवत नहीं कि कुदरत की मार से राहत दिला सकें. और सरकारी फरमान आया, उस सरकार का, जो हम कैसे ज़िन्दगी जिएँ, इसका फैसला करती है: ये पनाहगाहें अब और नहीं चल सकतीं. आखिर 28 फरवरी को गुजरे महीने बीत चुके थे और गुजरात आगे इस अहसास के साथ नहीं जी सकता था कि हालात गैरमामूली हैं. राशन बंद कर दिया गया, पनाहगाहों के संचालकों को धमकी दी जाने लगी. और सुप्रिया और गुजरात से आए कई दोस्तों ने राजीव धवन के दफतर में बैठ कर अर्जी तैयार की, अपने हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत में गुहार लगाई; इस बारिश में इन पनाहगाहों को टूटने से बचाने की गुहार. वकील ने मुस्करा कर कहा: मुझे हैरत होगी अगर यह अपील सुन ली जाए.
अर्जी, जिस पर हिन्दुस्तान के दो सौ से ज़्यादा लेखकों, कलाकारों के दस्खत थे, जिन्हें दूसरे, मामूली वक्तों में सरकारें इनामों से नवाजती हैं और जिनके अपना होने पर फख्र जताती हैं, कहीं नीचे फ़ेंक दी गई, धूल खाती रही, डेढ़ साल तक: इस बीच एक और बारिश आई. पनाह लिए लोगों ने ख़ुदा के सहारे अपने रास्ते चुने क्योंकि भारत की वह किताब जिसे संविधान कहते हैं, उनके बुरे वक्तों में उनके काम न आई.
फिर भी कहना ही होगा कि गुजरात में भी ऐसा न हुआ था. बुलडोजर और जे. सी. बी. मशीनों ने कैम्प नहीं उखाड़े थे. ऐसा करने के लिए तो आपको धर्मनिरपेक्ष आत्मविश्वास और अहंकार चाहिए था जो सिर्फ उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की हुकूमत के पास है. क्योंकि वह धर्मनिरपेक्ष है और उसके इरादे पर कोई शक नहीं कर सकता, वह मुज़फ्फरनगर के करीब लोई में तब इन कैम्पों को तोड़ सकती है जब ओस और कोहरा बरस रहा हो, सर्द हवाओं के थपेड़े लग रहे हों, पारा सिफर के करीब पहुँच चुका हो. इसके लिए धर्मनिरपेक्ष बेहिसी और बेरहमी चाहिए. तभी आपका आला अफसर यह कह सकता है कि बच्चे ठण्ड से नहीं मरा करते. और राज्य के मुखिया का पिता कह सकता है कि कैम्पों में कॉंग्रेस और बी.जे.पी. के एजेंट रह रहे हैं जिनका नापाक इरादा है उत्तर प्रदेश की मुस्लिम परस्त धर्मनिरपेक्ष सरकार को बदनाम करना.
तो इंडियन एक्सप्रेस की पृथा चैटर्जी ये किन लोगों से मिल आई हैं? ये कौन हैं जिन्होंने अपने इन  गैरकानूनी ठिकानों से अपने बच्चे और बोरिया-बिस्तर सरकारी टेम्पो पर लाद लिए हैं? किस धर्मनिरपेक्ष दिशा में ये जा रहे हैं, किन धर्मनिरपेक्ष आसरों की तलाश में ये निकल पड़े हैं? अपनी गायें, बैल और बकरियां साथ बांधे किधर को निकल पड़े हैं? क्या हिन्दुस्तान इनका घर है? क्यों पृथा को इनसे हमदर्दी है? क्या वे भी कॉंग्रेस और बी.जे. पी. की छिपी एजेंट हैं? सुनिए, पृथा को सुनिए: असीमा, जिसे हफ्ता भी नहीं हुआ बच्चा हुए, कहती है कि वह तीस दिसंबर की रात कभी भूल नहीं सकेगी. पानी गिर रहा था, ठण्ड थी और हम सब सरकारी बस स्टैंड के सामने थे जहां हमें सरकारी गाड़ी छोड़ गई थी. हम सब बारिश में भीगते, अपनी चीज-बस्त लादे-लादे अपनी-अपनी झुग्गी बनाने को चले.
“ “जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो क्या होगा? इस मर्तबा सरकारी अफसर ही नहीं, ग्राम-प्रधान भी हमारे खिलाफ हो गए. उन्होंने  कहा कि मुआवजे की कागजी कार्रवाई होते रहेगी, लेकिन हमें सरकारी जमीन छोड़ देनी होगी. और खुद को ठंड से बचाना होगा. तो यहाँ, इस खुले में ठंडे से हमारा बचाव कैसे हो रहा है?” तेईस साल की अफ़साना अपने बच्चों को, दो साला कशिश और चार साल के साहिर को राहत में मिले गर्म कपड़े पहनाते हुए कहती है.
मुलायम सिंह यादव का कहना है कि मुज़फ्फर नगर के पीड़ित और विस्थापित मुसलमानों को उनकी सरकार ने अभूतपूर्व राहत दी है. राहत के आगे अभूतपूर्व विशेषण लगाने के लिए भी आपके पास धर्मनिरपेक्ष अतीत का अनुभव चाहिए जो इस नेता के पास है, जिसे सैफई में उस वक्त राग-रंग करते कोई संकोच नहीं जब हजारों लोग ठंड, भूख और अपमान से जूझ  रहे हों और उत्तर प्रदेश में गरीब मुसलमान की हैसियत को परिभाषित  करने की कोशिश कर रहे हों.सुना है कि अपने जन्मोत्सव  के पहले मायावती जी को इन गरीबों की सुध आ गई है और वे अपने प्रतिनिधियों को हालात का जायजा लेने को भेज रही हैं. कुछ दिन पहले एक चिरक्रुद्ध राष्ट्रीय युवा नेता वहाँ  हो आए हैं और उन्होंने कैम्पों की बदहाली पर काफी नाराजगी जताई है.
जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे, राहत शिविर कहे जाने वाले ये बदनुमा दाग शायद बुलडोजरों की मदद से मिटाए जा चुके होंगे. जिसका कोई नहीं, उसका अल्लाह है, इस भरोसे ज़िंदगी बसर करने वाली मजलूमों की जमात हिन्दुस्तान की इस जमीन में कहीं समा गई होगी और आपको शायद कहीं दिखाई न देगी.
मुसलमान पहले ही हिन्दुस्तान की मुश्किल रहे हैं. इनकी वजह से वह खुल कर वंदे मातरम नहीं गा पाता, आर्थिक तरक्की की राह पर तेजी से भाग नहीं पाता क्योंकि अपनी जहालत के चलते ये उसके पैरों में बेड़ियों से पड़े हुए हैं और उसकी रफ़्तार में रुकावट डालते हैं. बीच-बीच में अपनी मूर्खता के चलते वे वे हिन्दुओं को उकसा देते हैं और स्वभाव से संत करुणाशील हिन्दुओं को क्षुब्ध कर डालते हैं.ऐसा करने के पहले वे यह नहीं समझ पाते कि इस क्रोध का उत्तर देना तो दूर इसका सामना करने की कुव्वत भी उनकी नहीं है.ऐसा भागलपुर,भिवंडी,बिहारशरीफ़,जमशेदपुर,मेरठ,नेल्ली, बोडोलैंड,सूरत,अहमदाबाद, बड़ोदा, जाने कितनी जगहों के अपने तजुर्बे से वे जानते हैं फिर भी बाज नहीं आते. सदियों से मुसलमानों के साथ मोहब्बत से रहते आए मुज़फ्फरनगर के बाशिंदों के धीरज का बाँध भी आखिरकार टूट ही गया. बेचारी उत्तरप्रदेश की सरकार कैसे गुस्से की इस बाढ़ को रोक पाती?
मुसलमानों के बारे में ऐसी स्थितियों में एक बात तकरीबन हर जगह सुनी: कि वे दरअसल दंगोंमें अपने घर बार इसलिए जला डालते हैं कि उन्हें मुआवजा मिल सके.जून, 2002 में एक रहमदिल डॉक्टर को बड़ोदा से तेजपुर के रास्ते में यही कहते सुना था; मुसलमान कैम्पों में अब तक इसलिए पड़े हुए थे कि वहाँ उन्हें पाँच-पाँच किलो चीनी मिल जाती थी और ढेर सा पैसा भी! हफ्ते में एक  दिन अपने खर्चे से आदिवासी गाँव में जाकर मदद करने वाले इस डॉक्टर में और मुज़फ्फरनगर के ग्रामीणों में कोई फर्क नहीं जिन्होंने रिपोर्टरों को कहा कि जाते-जाते मुसलमान अपने घर जला गए जिससे उन्हें मुआवजा मिल सके. यह भी कि वे कैम्पों में इस वजह से लौट रहे हैं कि मुआवजा मांग सकें.
सरकार का तर्क है कि एक बार जब पाँच लाख रुपए दे दिए, उन्हें कैम्पों में रहने का हक क्या और इसका तर्क क्या! यह मुआवजा देने के बाद सरकार उनकी देखभाल करने को कैसे जवाबदेह रह जाती है? अपने घर-गाँव से बेदखल कर दिए गए इन मुसलमानों पर ही अब उलटा आरोप लग रहा है कि वे अनधिकृत तरीके से कैम्प जबरदस्ती ज़िंदा रखना चाहते हैं. इससे राज्य का माहौल बिगड़ रहा है.
दिलनवाज, पृथा, चिंकी सिन्हा, नेहा दीक्षित, श्रीनिवासन जैन जैसे पत्रकार अपनी वस्तुपरकता या तटस्थता नहीं रख पाते जब वे इन विस्थापित मुसलमानों से मिलते हैं.उनमें भावुकता दिखाई पड़ती है जो पत्रकारिता के लिए स्वस्थ नहीं.
इन मुसलमानों के बारे में हम बात करते हैं तो कादिर राणा, आज़म खान या अतीक अहमद को क्या भूल जाते हैं? सत्या शिवरमन ने बताया कि कल इलाहाबाद पहुँचने पर हर तरफ उन्हें अतीक साहब को मुबारकबाद देती हुई होर्डिंग्स दिखाई दीं लोकसभा चुनाव के लिए उन्हें उम्मीदवार  चुने जाने के लिए.इसकी अश्लीलता क्या किसी को दिखाई नहीं देती? वैसे ही जैसे अगले चुनाव के बाद इस देश की बागडोर संभालने का दावा करनेवाले दलभारतीय जनता पार्टी   को उन नेताओं को सम्मानित करते कोई हिचक न हुई जिन पर मुज़फ्फरनगर की हिंसा भड़काने का आरोप है.
सवाल यह है कि राहत क्या है और क्या है मुआवजा ?क्यों मुसलमान जिद किए बैठे हैं कि वे अपने गाँव नहीं लौट नहीं सकते? क्यों वे मुज़फ्फरनगर और हिन्दुस्तान की साझा ज़िंदगी में खलल डालना चाहते हैं? यह सवाल उनका भी है जो राहत लेकर इनके पास जा चुके हैं: कि इन्हें लौट ही जाना चाहिए, कि इनमें से बहुतेरे ऐसे हैं जो सिर्फ खौफ के मारे भाग गए हैं, कि उनके साथ सीधे कुछ नहीं हुआ है. और क्या डर या खौफ के लिए वे मुआवजा मांग सकते हैं?क्या किसी समुदाय को खौफ मालूम हो तो उसे अपना इलाज नहीं कराना चाहिए? सरकार से इसमें क्या उम्मीद और क्यों?
मुजफ्फरनगर के हिन्दुओं ने गाय,बेटी और बहू बचाने के सम्मेलन किए थे. उसके बाद ही हमले हुए, हिंसा हुई और तकरीबन साथ हजार मुसलमानों को बेघरबार होना पड़ा. मुसलमानों पर पुराना आरोप है कि वे हिन्दू बहू-बेटियों पर बुरी आँख रखते हैं. 2002 में गुजरात में बाबू बजरंगी के नेतृत्व में इस मुस्लिम कुदृष्टि  से बचाने का पवित्र अभियान चलाया गया, फिर केरल और कर्नाटक में और अब उतरप्रदेश में.इस हिसाब से हर मुसलमान नौजवान शक के दायरे में है, हर किसी पर नज़र रखी जानी है.अगर इस गुस्से के दौरे में कुछ मुस्लिम लड़कियों , औरतों के साथ थोड़ी बहुत जबर्दस्ती  हो गई तो क्या उसके लिए सजा के अलावा कोई और रास्ता नहीं? आखिर मुसलमान भूलना और माफ़ करना क्यों नहीं जानते? क्यों वे हिंसा की याद जिंदा रखना चाहते हैं?

दिल्ली में नए साल की पहली सुबह धूप निकल आई है.खुले में बैठना भला लग रहा है. खुलेपन का यह सुकून मुजफ्फरनगर के मुसलमानों को कब नसीब होगा, यह सवाल क्या सिर्फ उनका ही होना चाहिए?


Courtesy- http://kafila.org/

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