Friday, December 21, 2012

कविता -जिस्म ही नही हूँ मैं


संध्या नवादिता

 photo courtesyhttp://www.egyptindependent.com


जिस्म ही नही  हूँ मैं,कि पिघल जाऊॅं
तुम्हारी वासना के आग में
क्षणिक उत्तेजना के लाल डोर,नही तैरते मेरी आँखों  में,
काव्यात्म यग्घता ही नही मचलती
हर वक्त मेरे होंठों पर
बल्कि मेरे समय की सबसे मजबूत मांग रही है,
मै भी वाहक हूँ
उसी संघर्षमयी परंपरा की
जिसके परचंम के तले होने का दावा तुम्हारा है,
मुझमें तलाश  मत करो
एक आदर्ष पत्नि
एक शरीर बिस्तर के लिए,
एक मषीन वंषवृद्वि के लिए,
एक गुलाम परिवार के लिए,
मै तुम्हारी साथी हूँ
हर मोर्चे पर तुम्हारी संगिनी,
शरीर के स्तर से उठकर,वैचारिक भूमि पर एक हों  हम
हमारे बीच का मुद्दा हमारा स्पर्ष ही नही
समाज पर बहस भी होगी

मैने पकडा है तुम्हारा हाथ,कि और अधिक मजबूत हो हम
आॅखें भावुक प्रेम ही नही दर्षाती
शोषण के विरुद्व जंग की चिन्गारीयाॅ भी बरसाती हैं,
होठ प्रेमिका को चूमते ही नही
क्रांति गीत भी गाते है, युद्व का बिगुल भी बजाते है
बाहों में आलिंगन ही नही होता,
दुष्मनों की हड्डियां भी चरमराती है
सीने में प्रेम का उफान ही नही ,
विद्रोह का तुफान भी उठता है,
आओ हम लडे एक साथ,अपने दुष्मनों से
कि आगे से कभी लड़ाई हो
एक साथ बढ़ें अपनी मंजिल की ओर
जिस्म की शक्ल में नही
विचारधारा बन कर



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