Monday, December 17, 2012

मध्य प्रदेश गैरकानूनी गिरफ्तारियों वाला सूबा


सुभाष गाताड़े

क्या शान्त कहे जानेवाले सूबा मध्यप्रदेश में आन्तरिक हालात इतने खतरनाक हो चले हैं कि 'उपद्रवग्रस्त इलाकों' की तुलना में वहां अधिक लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरोधात्मक हिरासत में रखना पड़ रहा है ?दरअसल सूचना के अधिकार के तहत एक अग्रणी अख़बार इण्डियन एक्स्प्रेस द्वारा हासिल आंकड़ें यही कहानी बयान करते हैं। और ऐसी हिरासत के मामले में मध्यप्रदेश मणिपुर एवं नागालैण्ड जैसे अशान्त कहे जानेवाले सूबों से या उत्तर प्रदेश जैसे सूबे से होड़ करता दिखता है।
                
 स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के तमाम काण्डों, नौकरशाहों यहां तक क्लर्कों के घरों से बरामद करोड़ों रूपए के मामले या क्लिनिकल ट्रायल के नाम पर डाक्टरों, कम्पनियों की मिलीभगत से एवं राज्य सरकार की अनदेखी के चलते होने वाली गरीबों की मौतों के चलते लगातार सूर्खियों में रहनेवाले इस सूबे के इस पहलू पर लोगों की नज़र नहीं गयी है।
                   
मालूम हो कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून 1980, जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है, देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचा सकनेवाले,विदेशी मुल्कों के साथ उसके रिश्तों को बाधित कर सकनेवाले तत्वों पर नकेल डालने के लिए तथा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने एवं जनता के लिए आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति की गारंटी करने के लिए उसका गठन इसलिए किया गया था। इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को कम से कम एक साल के लिए बिना जमानत के जेल में डाला जा सकता है, इतना ही नहीं पहले से ही जेल में बन्द लोगों पर भी इसे लागू किया जा सकता है। मगर अब जैसे कि तथ्य सामने आ रहे हैं कि इस कानून को तोड मरोड कर इस्तेमाल किया जा रहा है तथा अपने राजनीतिक दुश्मनों से निपटने एवं समुदाय विशेष को निशाना बनाने का यह आसान जरिया बना है।
                   
केन्द्रीय गृहमंत्रालय द्वारा हासिल आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2009-2011 के दरमियान इन चार राज्यों में इस कानून के तहत कुल 4142 गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें से 3306 गिरफ्तारियों पर मंत्रालय ने अपनी संस्तुति प्रदान की, जिनमें से 785 गिरफ्तारियां अर्थात लगभग 25 फीसदी गिरफ्तारियां अकेले मधयप्रदेश से थीं। दरअसल इस कानून के तहत यह प्रावधान है कि बन्दी बनाए व्यक्ति के बारे में विवरण को केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भेजना पड़ता है, जो इस विवरण के आधार पर मामलों की छानबीन करती है। उसे यह भी अधिकार है कि वह राज्य द्वारा प्रस्तुत कारणों से असहमत हो एवं गिरफ्तारी को खारिज करे।
               
इन चार राज्यों में ही इस कानून के तहत हुई गिरफ्तारियों का 93 फीसदी हिस्सा सामने आया। जब मध्यप्रदेश राज्य के गृहसचिव से इस सम्बन्ध में पूछा गया तो उन्होंने बिना जमानत के सैंकड़ों लोगों को जेल में डालने को सही ठहराते हुए कहा कि वह इस कानून का इस्तेमाल अपराधी तत्वों,साम्प्रदायिक संगठनों के खिलाफ करते हैं एवं महिलाओं एवं बच्चों पर होने वाले अपराध को रोकने के लिए करते हैं। याद रहे कि गृहमंत्रालय ने इन गिरफ्तारियों का विस्तृत विवरण नहीं दिया, अगर यह विवरण उपलब्ध होता तो पता चलता कि इस कानून के निशाने पर क्या वाकई 'अपराधी तत्व' आ रहे हैं या जनान्दोलनों की अगुआई करनेवाले अग्रणियों, राजनीतिक विरोधियों को सबक सीखाने का यह जरिया बना है। स्पष्ट है कि शान्त कहे जानेवाले मध्यप्रदेश सरकार को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सकें।
                   
वैसे जनद्रोही कानूनों के इस्तेमाल में ही नही बल्कि मध्यप्रदेश सरकार मैजिस्टे्रट की इजाजत दरकिनार कर धारा 109-110के तहत हजारों लोगों को गिरफ्तार करने के मामले में भी हाल में विवादों में आयी है। राजस्थान पत्रिका ने जुलाई के दूसरे सप्ताह में इस सम्बन्ध में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी,जो बताती है कि प्रदेश में पुलिस अफसर मजिस्टे्रट के वारंट के बिना ही गिरफ्तारी कर रहे हैं। यह गिरफ्तारी धारा 109-110 में की गई है, जिसके लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना अनिवार्य है। अख़बार के मुताबिक ऐसे में 71हजार लोगों की गिरफ्तारी पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। अगर हम 1 नवम्बर 2010 से 31 मार्च 2012 तक की गई गिरफ्तारियों के विवरण को देखें तो धारा 109 के अन्तर्गत 32787 तथा धाारा 110 के अन्तर्गत 38,446 लोग जेल में ठूंसे गए हैं।
                    
मालूम हो कि दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत पुलिस को अधिकार दिए गए थे कि अपराध या संदेह की स्थिति में वह बिना सक्षम अधिकारी के वारंट के इन धाराओं के तहत गिरफ्तार कर सकती है। हम कल्पना ही कर सकते हैं कि पुलिस को दिए गए इन अधिकारों का कितने बड़े पैमाने पर दुरूपयोग हुआ होगा और उसने गिरफ्तारी का डर दिखा कर कितने लोगों को आतंकित किया होगा,घुसखोरी की होगी एवं पैसा न देनेवालों को जेल में डाला होगा। लाजिम था कि पुलिस को प्राप्त इन असीमित अधिकारों के खिलाफ बढ़े जनाक्रोश के चलते ही राज्य सरकार इन धाराओं को संशोधित करने के लिए मजबूर हुई और उसने 1 नवम्बर 2010 से इन अधिकारों को वापस लिया था और पुलिस के लिए यह अनिवार्य बना दिया था कि वह मजिस्ट्रेट के वारंट के बिना ऐसी गिरफ्तारी अब नहीं कर सकती है।
                
 सोचने का सवाल यह बनता है कि सरकार ने जिन 71 हजार से अधिक लोगों को 'गैरकानूनी ढंग से' जेल में डाला है, इस महागलति को वह किस तरह ठीक करती है। दो काम बेहद जरूरी बनते हैं, गैरकानूनी ढंग से बन्दी बनाएं गए इन तमाम लोगों को जेल से तत्काल रिहा किया जाए, सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के लिए उन्हें मुआवजा दिया जाए और सबसे बढ़ कर इस मामले को आज तक दबाए रखने के लिए राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ही नहीं बल्कि राज्य के गृहमंत्री भी नैतिक आधार पर अपना पद छोड़ें या मुख्यमंत्री उन्हें तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दे।


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