Tuesday, January 18, 2011

पहचानः संकट और प्रतीक


पहचानः संकट और प्रतीक



‘पहचान’ शब्द का प्रचलित मतलब एक जटिल अवधारणा है। इसकी चीरफाड़ करना ठीक वैसा ही कठिन है, जैसा ‘ईशवर है कि नहीं है’ जैसी बहस में पड़ना। यह एक मूल्य, देश , काल और परिस्थिति सापेक्ष अवधारणा है। बहुत से लोगों की कोई एक पहचान हो सकती है, मसलन मुस्लिम पहचान या हिन्दू पहचान। इसके उलट एक ही व्यक्ति की एक से अधिक पहचान भी हो सकती हैं। जैसा कि मेरे एक मित्र शशिकांत के साथ है, वे ‘हिन्दू’ हैं, ‘ब्राम्हण’ हैं, ‘कांग्रेसी’ हैं, कांग्रेसी हैं तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ ( ? ) तो होना ही है। ये एक स्वयंसेवी संगठन के कर्ताधर्ता भी हैं तो ‘समाजसेवी’ भी कहलाते हैं। तो इनके साथ आसानी यह है कि जब जिस पहचान से फायदा हो, उसको जेब में से निकालकर अगले को दिखा सकते हैं। 

कुछ ‘पहचान’ तो पैदा होते ही इंसान को मिल जाती हैं। किसी का हिन्दू, मुसलमान, ब्राम्हण नर, मादा या अनुसूचित जाति का होना इसी तरह की पहचान हैं। इनको मिटाना आसान नहीं होता। हालांकि ये बुनियादी पहचान की तरह लगती हैं पर अतीत में कभी ना कभी गढ़ी गई हैं। पहचान तब बहुत प्रासंगिक हो उठती है, जब इस पर संकट आता है, या ऐसा बताया जाता है कि पहचान संकट में है। शशिकांत जी के उदाहरण से समझें तो उनकी हिन्दू पहचान उस वक्त बाकी सारी पहचानों से बड़ी हो गई थी जब लालकृष्ण अडवाणी रथ पर सवार होकर रामजी का मन्दिर बनाने निकले थे। ‘पहचान’ का सबसे बड़ा संकट यह है कि इसको कुछ लक्षणों के साथ जोड़कर देखा जाने लगता है। जैसे यह कहना कि, ‘मुसलमान’ है तो ‘माँसाहारी’ तो होगा ही। इस तरह के लक्षणों के आधार पर लोग एक दूसरे के प्रति धारणाएं बनाते हैं, जो अक्सर अन्य ‘पहचान’ के लोगों के प्रति दुर्भावना के रूप में दिखाई देती है। 

‘पहचान’ का कारोबार प्रतीकों के बिना नहीं चल सकता। चेहरे पर दाढ़ी का होना या ना होना, गले में लटकता क्रास का लाकेट, भगवा अंगोछा, नीला अंगोछा, सिन्दूर भरी और सिन्दूर से रहित मांग, ध्वनि विस्तारक यंत्र से प्रसारित होती आरती, भारत माता और देश का झण्डा, ये सारे ‘पहचान’ के प्रतीक हैं। आप चाहें तो इसमें कई चीजें और जोड़ सकते हैं।               

दरअसल व्यक्तिगत पहचान जैसी कोई चीज होती नहीं है, हो भी नहीं सकती। क्योंकि कोई भी चीज व्यक्त होते ही ‘सामाजिक’ के दायरे में चली जाती है। हां, लोगों को भ्रमित जरूर किया जा सकता है कि उनकी पहचान संकट में है। मुझे लगता है कि ‘पहचान’ एक सामाजिक राजनैतिक मसला है। आम आदमी की जिन्दगी में इसकी जगह दाल रोटी और प्यार मोहब्बत से, बहुत पीछे होती है।                                                              

फर्क इस बात से पड़ता है कि लोगों के लिये कौन सी ‘पहचान’ महत्वपूर्ण है। लोग कोई संकीर्ण पहचान, जैसे जाति या धर्म की पहचान को चुन सकते हैं। और बड़ी पहचान भी चुन सकते हैं, जैसे कि भारतीयता या लोकतांत्रिक मूल्यों में भरोसा रखना। 
देश और समाज आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा ? यह इसीसे तय होगा कि आप किस ‘पहचान’ को महत्वपूर्ण मानते हैं।  
                                                                                                                                        - चन्दन यादव

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