यह बड़े  बाधों की ५०वी  सालगरह  है ! पिछले ५० वर्षों में देश और दुनिया में विकास के वर्तमान माडल पर एक   बहस उपजी है ,  की वर्तमान विकास, विनाश भी साथ लाता है या विकास किस के लिए है ?इसी सन्दर्भ में बरगी बांध जो की नर्मदा नदी पर बना पहला बड़ा बांध है की समीक्षा करने की कोशिश की गयी है बरगी बांध से जुड़े हुए सवालों और   उससे परभवित लोगों से जुड़े हूए लोगों की दास्तान आपके साथ बाटने के लिए यह श्रंखला आपके बीच लाई जा रही है !प्रस्तुत है साथी प्रशांत कुमार दुबे और रोली शिवहरे के इस श्रंखला का पहला आलेख !
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
@ प्रशांत कुमार दुबे/रोली शिवहरे @

साहब, इंदिरा गांधी के कहने पर बसे थे जहां पर !! अब आप ही बताओ कि देश  का प्रधानमंत्री आपसे कहे कि ऊंची जगह पर बस जाओ, तो बताओ कि आप मानते कि नहीं !!! हमने हां में जवाब दिया जो उन्होंने कहा कि हमने भी तो यही किया। उनकी बात मान ली तो आज यहां पड़े हैं। इंदिरा जी बरगीनगर आईं थीं और उन्होंने खुद आमसभा में कहा था। श्रीमति गांधी ने यह भी कहा था कि सभी परिवारों को पांच-पांच एकड़ जमीन और एक-एक जन को नौकरी भी देंगें । अब वे तो गईं ऊपरे और उनकी फोटो लटकी है, अब समझ में नहीं आये कि किस  से सवाल करे ? का उनसे, का उनकी फोटो से, का जा सरकार से ?सरकार भी सरकार है, वोट लेवे की दान (बारी) तो भैया, दादा करती है और बाद में सब भूल जाते हैं। फिर थोड़ा रुक-कर कहते हैं पंजा और फूल, सबई तो गये भूल ।। यह व्यथा है जबलपुर जिले की मगरधा पंचायत के बढ़ैयाखेड़ा गांव के दशरु/मिठ्ठू आदिवासी की।

 बढ़ैयाखेड़ा इसलिये विषिस्ट हो जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से रानी अवंती बाई परियोजना के अंर्तगत् बरगी बांध का पानी भरा है और एक ओर है जंगल। यानी यह एक टापू है । एक एसा टापू जिससे जीवन की न्यूनतम आवष्यकता की पूर्ति के लिये भी कम से कम 10 किलोमीटर जाना होगा और वह भी नाव से। कोई सड़क नहीं। पानी जो भरा है वहां पर । अगर किसी को दिल को दौरा भी पड़ जाये और यदि उसे जीना है तो उसे अपने दिल को कम से कम तीन घंटे तो धड़काना ही होगा, तब कहीं जाकर उसे बरगीनगर में न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा नसीब हो पायेगी। और वो भी तत्काल कश्ती मिलने पर। सुसाईटी (राशन दुकान) से राशन लाना है तो भी कश्ती और हाट-बाजार करना है तो भी कश्ती। यानी कश्ती के सहारे चल रहा है जीवन इनका। कहीं भी जाओ, एक तरफ का 10 रुपया। 

दशरु कहते हैं पहले अपनी खेती थी तो ठाठ से रहते थे। क्या नहीं था हमारे पास । मेरी 10 एकड़ जमीन थी, मकान था, महुए के 15 पेड़, आम के 2 पेड़, सागौन के 5 पेड़, 18  मवेशी थे। दो फसल लेते थे।
जुवार, बाजरा, मक्का, तिली, कोदो, कुटकी, धान, समा, उड़द, मूंग, राहर, अलसी, गेहूं, चना, सरसों, बटरा और सब्जी भाजी जैसी कई चीजें। नमक ओर गुड़ के अलावा कभी कुछ नहीं लिया बाजार से हमने । तेल तक अपना पिरवा लेते थे हम । अब इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि शिवरात्रि पर भोले को चढ़ने वाली गेहूं की बाली भी दूसरे गांव से लाते हैं ! पहले चना महुआ का तो भोजन था साहब  !पर आज तो सुसाईटी से 20 किलो लात हैं और आधो-दूधो (आधे पेट) खात हैं। उसमें भी आने-जाने के कश्ती से 20 रुपये लगते हैं और कहीं उस दिन दुकान नहीं खुली तो राम-राम।



ज्ञात हो कि रानीं अवंतीबाई परियोजना अंर्तगत् नर्मदा नदी पर बने सबसे पहले विशाल बांध बरगी से मंड़ला, सिवनी एवं जबलपुर जिले के 162 गांव प्रभावित हुये हैं और जिनमें से 82 गांव पूर्णतः डूबे हुये हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 7000 विस्थापित परिवार हैं, इनमें से 43 प्रतिशत आदिवासी,12 प्रतिशत दलित, 38 प्रतिशत पिछड़ी जाति एवं 7 प्रतिशत अन्य हैं। जबकि बरगी बांध विस्थापित एंव प्रभावित संघ की मानें तो 10 से 12 हजार परिवार विस्थापित हैं। दशरु का बढैयाखेड़ा भी जबलपुर जिले का पूर्ण डूब का गांव है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यहां पर 25 परिवार हैं परन्तु अब यहां पर 42 परिवार हैं। 

माहू ढ़ीमर, जो अपने आपको गांव का कोटवार मानते हैं, बताते हैं कि हमारे गांव का खेती की जमीन का रकबा 1600 एकड़ का था और अब तो चारों  तरफ मैया ही मैया है यानी पानी ही पानी है। हमारे जंगल कहां गये ?पानी की ओर ईशारा करते हैं और कहते हैं कि यहीं नीचे ही हैं। हम तो वो दवाई भी भूल ही गये जो जंगल से मिलती थी। अपना ईलाज खुद करना जानते हैं। पहले नीचे पांचवीं तक का स्कूल था। हम 1986 में यहां आये और उसके बाद 10 साल यहां कोई स्कूल नहीं था । 1997 से यहां पर स्कूल बना, लेकिन इस 10 साल में तो हमारी एक पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया ? आंगनवाड़ी भी बहुत बाद में बनी और वह भी ना के बराबर ही है। कभी खुलती है तो कभी नहीं। आवागमन के साधन के अभाव में जननी सुरक्षा योजना से लाभ मिलने का प्रष्न गैर वाजिब ही था लेकिन लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि हमारे यहां सभी प्रसव घरों में ही होते हैं ओर दाई के ना होने के कारण स्थानीय महिलायें ही कराती हैं। ऐसे में राष्ट्रीय मातृत्व सहायता योजना का नाम आता है तो इससे लाभ लेने का प्रतिशत भी शून्य ही है।

 सरकारी रिपोर्ट की ही मानें तो विस्थापन के बाद से परिवारों का मुख्य व्यवसाय कृषि के स्थान पर मजूदरी रह गया है।  कृषि, बांस के सामान, किराना, लुहारगिरी जैसे व्यवसायों में गिरावट आई है जबकि मजदूरी, मत्स्याखेट, सब्जीभाजी, पशुपालन आदि में लोग संलग्न हैं। मजदूरी में  अप्रत्याशित रुप से बढ़ोतरी हुई है। इसका असर इस गांव में भी देखने को मिलता है। इस गांव के 80 प्रतिशत लोग पलायन पर गये हैं। कोई जबलपुर में निर्माण मजदूरी कर रहा है तो कोई नरसिंहपुर में खेती की मजूरी करने गया है। इस गांव के नवयुवक अभी बाणसागर, खुडिया डेम में मछली मारने गये हैं । तीन से चार महीने मारेंगे। इस गांव में क्यों नहीं मारते हैं मछली ?तो रछछू बरऊआ बीच में ही बात काटते हुये कहते हैं कि यहां रहेंगे तो भूखे मर जायेंगें ? एक तो मछली कम है और दूसरा ठेकेदार रेट भी नहीं दे रहा है। 18 रुपया किलो बिकती है जबकि शहर में यह दस गुन ज्यादा बिकती है। यानी हमें तो छैहर (मछली के ऊपर का छिलका) तक के पैसे नहीं मिल रहे हैं। जबकि मेहनत पूरी हमारी ।

 इसी गांव के सुनील की उम्र 30 हो रही है लेकिन उसकी शादी नहीं हो रही है। लड़की वाले कहते हैं कि हम अपनी लड़की को यहां मरने के लिये क्यों छोडें? और फिर हमारे पास है ही क्या ? एक-दो साल कोशिश और कर लेते हैं, कुछ हो गया तो ठीक।

 सरकार की तरफ से कोई परिवहन की व्यवस्था नहीं की गई क्या ? या सरकार से आप लोगों ने मांग नहीं की क्या ? इस पर वे कहते हैं कि हमें तो अलग-अलग लोगों ने लूटा । पिछली साल कलेक्टर राव आये थे और उन्होंने कहा था कि तीन कश्ती  लाई जायेंगी जो तीन गांवों के लिये होंगी। समिति के माध्यम से वह चलाई जायेंगी। फिर सभी हंसते हैं और कहते हैं कि समिति तो बन गई थी पर राव साहब ही चले गये। और आज तक नहीं आई कश्ती। यदि हम कलेक्टर की बातों में आ जाते और हमारे गांव की कश्ती नहीं हो तो हम तो यहीं मर जाते ! 

पूरे देश  में राजगार गारंटी की चर्चायें जोरों पर है । इस गांव में भी लोगों के जॉब कार्ड तो हैं लेकिन यहां पर पिछले तीन सालों से कोरे पड़े वे व्यवस्था को और काम के अधिकार को चिढ़ा रहे हैं। जब उनसे रोगायो की बात कही तो वे कहते हैं कि हां कार्ड तो है लेकिन चूंकि उन्हें काम नहीं मिला है, इसलिये वे पक्का नहीं कह सकते हैं कि यही जॉब कार्ड है। वे शिवराज सिंह की फोटो वाले तीन कार्ड के साथ जॉब कार्ड भी लाते हैं। लेकिन अफसोस कि कार्ड तो सारे हैं परन्तु सभी कोरे के कोरे। काम ना मिलने की वजह यह है कि वैसे तो यह आबाद गांव है लेकिन सरकारी रिकार्ड में यह वीरान गांव है। शोभेलाल कहते हैं कि हमें यह नहीं पता है कि पहले का राजस्व गांव बढैयाखेड़ा, अभी फॉरेस्ट का है या इलीगेशन (ईरीगेशन) का है। इसी दुविधा के कारण आज भी लोगों के हाथ खाली हैं।

यहां पर आज भी बिजली नहीं है, लोग इस बात से आस बंधा रहे हैं कि खंभे तो आ गये हैं । पिछले 25 वर्षों में दूसरों को बिजली देने के कारण डूबे इन गांवों में आज भी अंधेरा है। यहां पर आजीविका का काई साधन नहीं है, लोग पलायन पर जा रहे हैं। यदि मजदूरी पर जाना भी है तो लोगों को 20 रुपये पहले अपने खर्च करने पड़ते हैं, महिलओं  के पास तो पिछले 25 वर्षों  से घर काम के अलावा कोई काम ही नहीं हैं और यही कारण है कि यहां के नवयुवकों यहां से बाहर निकालने के लिये कलेक्टर को पत्र लिखा है। लोग इतने हताश हैं कि रछछू कहते हैं कि सरकार ने हमें डुबा तो दिया है, बस अब एक परमाणु बम और छोड़ दे तो हमारी यहीं समाधि बन जाये। तभी तो है यह ‘‘विकास के विनाश  का टापू।’’



दशरु