Friday, August 8, 2014

समय से रूबरू हम

सुभाष गाताडे

 हे मूर्ख, मैंने तुम्हे नदी पार करने के लिए नाव दी थी, नदी पार हो जाने के बाद कंधे पर ढोने के लिए नहीं   

                                                                         बुद्ध


“I believe that despite the enormous odds which exist, unflinching, unswerving, fierce intellectual determination, as citizens, to define the real truth of our lives and our societies is a crucial obligation which devolves upon us all. It is in fact mandatory. If such a determination is not embodied in our political vision we have no hope of restoring what is so nearly lost to us – the dignity of man.”
(Harold Pinter while delivering the speech at the award of Nobel Prize for Literature in 2005)
1

अपने वक्त़ के महान अदीब प्रेमचन्द के जन्मदिन पर हम उन्हें याद करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। यह सोच कर थोड़ा सुकून भी हो रहा है कि हम इस मामले में अकेले नहीं हैं। देश के तमाम नगरों में, छोटे मोटे कस्बों में आज उनकी याद को लोग ताज़ा कर रहे हैं। कहीं विचारगोष्ठी हो रही है, कवि सम्मेलन हो रहे हैं, तो कहीं समाज के सामने खड़े मसलों को लेकर तबादले खयालात चल रहे हैं।

मैं कभी अपने आप से पूछता हूं कि एक ऐसा शख्स - जिसे कलम का सिपाही कहा गया, उसके गुजर जाने के 75 से अधिक साल बाद भी आखिर किस वजह से हम उन्हें याद कर रहे हैं ? लिखा तो कइयों ने था। हो सकता है कि कइयों का रचना संसार, ग्रंथ भंडार उनसे बड़ा होमगर लिखना मतलब शब्दों को तरतीब से रखना, लाइनों को सजा कर रखना नहीं होता। उसके जरिए क्या कहा जा रहा है? किनके दुखों, तकलीफों, आकांक्षाओं, अरमानों, संकल्पों को जुबां दी जा रही है, वह अहमियत रखता है और महज लिखा ही नहीं बल्कि अपने उसूलों के लिए समझौताविहीन जिन्दगी जी। पुरस्कारों की बंटती रेवडियों के मौजूदा माहौल में जबकि क्रिकेट के मैचों की तरह पुरस्कार भी कई बार फिक्स किए जाते हैं, उनका जीवन एवं उनका संघर्ष कलम एवं कागज के बीच के या कलम एवं टीवी के बीच के समीकरण को सुलझाने में मुब्तिला हम सभी को शायद अधिक मौजूं जान पड़ता है।

इस सन्दर्भ में मुझे बरबस हरिशंकर परसाईजी का वह लेख याद आ रहा है जिसका शीर्षक है प्रेमचंद के फटे जूते। आप में से अधिकतर ने प्रेमचंद की उस तस्वीर के साथ कई स्थानों पर प्रकाशित उस आलेख को पढ़ा होगा, जिसमें प्रेमचंद अपनी पत्नी के साथ फोटो खींचवा रहे हैं, पैरों में कैनवास के जूते हैं, और बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है।

आप ने भले पढ़ा हो, मगर इस मौके पर आप के साथ उसे सांझा करने का मोह रोक नहीं पा रहा हूं। शायद वह उस राज का खुलासा करता है कि प्रेमचंद हमें आज भी क्यों मौजूं जान पड़ते हैं।
परसाई लिखते हैं कि

फोटो खिंचाने की अगर यह पोशाक है तो पहनने की कैसी होगी? नहीं, इस आदमी की अलग अलग पोशाकें नहीं होगी - इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है।

वह पूछते हैं
मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अंगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हे इसका जरा भी एहसास नहीं है ?’

वह प्रेमचंद के चेहरे की उस अधूरी मुस्कान की भी चर्चा करते हैं

यह मुस्कान नहीं है, इसमें उपहास है, व्यंग है।
चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया ?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज़ जो परत दर परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार मार कर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आजमाया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियां पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।
तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमजोरी थी, जो होरी को ले डूबी।

लेख के अन्त में वह उनके अंगुली के इशारे की बात करते हैं और उस व्यंग मुस्कान की बात करते हैं,
तुम मुझ पर या हम सभी पर हंस रहे हो, उन पर जो अंगुली छिपाए और तलुआ घिसाए चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो - मैंने तो ठोकर मार-मार कर जूता फाड़ लिया, अंगुली बाहर निकल आई, पर पांव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अंगुली को ढांकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे ?’

2.

ईमानदारी की बात यह है कि मैं कभी अदीब का तालिब, साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा, मगर साहित्य/कलम की ताकत मुझे हमेशा मुग्ध करती रही है।

फिर 19 वीं सदी का वह चर्चित गुलामी प्रथा विरोधी उपन्यास हो जिसकी रचना अमेरिकी लेखिका हैरिएट बीचर स्टो ने की थी, जिसके बारे में कहा जाता है कि 1852 में प्रकाशित इस उपन्यास ने ‘‘गुलामी प्रथा के खिलाफ बाद में छेड़े गए गृहयुद्ध की जमीन तैयार की।’’ कहा जाता है कि राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन जब 1862 में किसी समारोह में लेखिका से मिले तो उन्होंने आश्चर्यचकित होकर पूछा था ‘‘तो तुम ही हो वह कृशकाय महिला जिसने वह किताब लिखी और जिसने इस महान युद्ध की शुरूआत की।’’ या फ्रांसीसी क्रांति की पूर्वपीठिका तैयार करनेवाले महान साहित्यकारों के तमाम प्रसंग हों या 1968 के ऐतिहासिक छात्रा-मजदूर आन्दोलन के वक्त महान लेखक और दार्शनिक सात्र्रा को गिरफ्तार करने की पुलिस की मांग पर राष्ट्रपति द गाल बेसाख्ता कह उठते हों कि मैं फ्रांस को कैसे गिरफ्तार कर सकता हूं’ ?

और आज के समय में शायद उन सभी को याद करने की अहमियत अधिक जान पड़ती है जब स्वतंत्र विचार पर तरह तरह की संकीर्णमना, बन्ददिमाग, कुन्दजेहन ताकतों की बन्दिशें बढ़ गयी हो, हमारी सन्तानों को पाठयक्रम में अन्य समुदायों के प्रति नफरत फैलानेवाली, गल्प को इतिहास के तौर पर परोसनवाली और विज्ञान के साथ द्रोह करनेवाली रचनाएं नैतिक तालीम के नाम पर पढ़ायी जा रही हों, जब हमें बताया जा रहा हो कि क्या लिखा जाना चाहिए, कैसे लिखा जाना चाहिए, किस किस्म की चाशनी में डूबा कर लिखा जाना चाहिए और अगर हमने इसके बावजूद भी हिम्मत की, अगर हमने उनके तालिबानी फरमानों को मानने से इन्कार कर दिया, तब फिर चाहे पूंजी की ताकतें हों या देश एवं समाज को आपसी नफरत पर टिके किसी मध्ययुग के उनके वैभवशाली अतीत में ले जाने के लिए आमादा सियासतदां और उनके उत्पाती गिरोह आप को गिरेबान पकड़ने के लिए आगे आने के लिए आमादा हों।

ऐसे घटाटोप भरे माहौल में प्रेमचंद का उद्बोधन जब वह साहित्य के मयार बदलने की’, ‘साहित्य की कसौटी बदलने की बात करते हैं, एक तरह से आवाहन मालूम पड़ता है।

‘..हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो - जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।

मित्रों, आप सभी ने विख्यात पत्रकार परिनोय गुहा ठाकुरदा द्वारा गैस वार्स पर लिखी किताब को लेकर अम्बानी समूह द्वारा 150 करोड डालर के मानहानि के मुकदमे के बारे में सुना होगा, मगर शायद एयर इंडिया और सहारा समूह को लेकर चली कार्रवाइयों पर अधिक चर्चा तक नहीं हो सकी है।

कहने का लुब्बेलुआब यह है कि हमारे मुल्क में विगत कुछ समयों से उछाल मार रही आहत भावनाओं वाली ब्रिगेड के रणबांकुरों से लेकर कार्पोरेट सम्राटों तक और सरकारी अमलों के बीच एक अपवित्रा गठबन्धन कायम हुआ है, जो असहमति की हर आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं और हाल के समय में मुल्क में जो सियासी बदलाव देखने को मिला है, उससे गोया ऐसी ताकतों को और अधिक उन्मादी होने का अवसर मिला है।

बचपन से हम सुनते आए थे कि किताबें पढ़ने के लिए होती हैं, सुनने के लिए होती हैं, गुनने के लिए होती है, मगर वक्त़ का फेर देखिए इन दिनों किताबों के लुगदी बनाने की बातें अधिक चल रही हैं। हिन्दू धर्म का वैकल्पिक इतिहास के नाम से लिखी गयी अमेरिकी विदुषी वेंडी डोनिगर की किताब को प्रकाशक पेंग्विन द्वारा वापस लिए जाने और उसकी लुगदी बनाने की बात से जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह फिलवक्त़ रूकने का नाम नहीं ले रहा है, आलम तो यह है कि कई सालों से प्रकाशित और चर्चित किताब के कुछ अंश अचानक कुछ संगठनों को आक्षेपार्ह लग रहे हैं।

विडम्बना देखिए कि इस मुहिम में अदालत भी साथ दे रही है।
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप खोजी पत्रकारिता करके किसी अडानी-अम्बानी के बारे में लिख रहे हैं या किसी धर्म के इतिहास को विज्ञान की कसौटी पर कस रहे हैं, आप साहित्य भी लिखेंगे तो उसमें मुमकिन है विचार जगत के इन पहरेदारों को कुछ नागवार गुजरे और वह कानूनी और गैरकानूनी किसी भी तरीके से आप पर शिकंजा कसने की कोशिश करें।

पिछले दिनों मैं महाराष्ट्र गया था, वहां किसी ने अदालत में दावा किया कि चर्चित लेखक आनन्द यादव ने तुकाराम और ज्ञानेश्वर पर जो उपन्यासनुमा किताबें लिखी हैं, उसने उसकी आस्था को चोट पहुंचायी है और अदालत ने भी किताबों के लुगदी बनाने का फरमान जारी किया है। मराठी साहित्य के ज्ञाता बता सकते हैं कि आनंद यादव, मराठी साहित्य जगत के स्थापित नाम हैं, सम्भवतः किसी समय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, अपने इन दोनों उपन्यासों के लिए उन्होंने काफी अनुसंधान भी किया है, मगर यह सभी बातें उनकी किताबों के लुगदी बनने को रोक नहीं सकतीं। हां, फिलवक्त उच्च अदालत का इन्तज़ार है कि वह इस मामले में क्या कहती है।
एक ऐसे वक्त़ में जब पत्रकारिता को सत्ता या सम्पत्तिशालियों की पीआर/पब्लिक रिलेशन मशीनरी में तब्दील करने के प्रयास चल रहे हों, साहित्य को उन लोगों की जय बोलने के लिए कहा जा रहा हो, तब बकौल मुक्तिबोध यही बात दोहरानी पड़ेगी कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का वक्त़ अब आ गया है।

3

किसी विचारक ने लिखा है कि चीज़ों को बदलने की शुरूआत तभी हो सकती है, जब हम उन्हें ठीक से जानें

और जानना आंख मूंद कर नहीं - जैसा कि मनुष्य को गाफिल रखनेवाले तमाम यथास्थितिवादी फलसफों में कहा जाता है, और तरह तरह के टेलीसन्तों/महात्माओं के माध्यम से चौबीस घण्टों प्रवचनों के जरिए सीखाया जाता है - बल्कि आंखें पूरी तरह खुली रख कर जानना। इन्सान की दुश्मन ताकतों की आंखों में आंखें डाल कर जानना। आज से ढाई हजार साल पहले भाग्यवाद को चुनौती देते हुए उन्होंने हमें बताया था कि दुख है तो उसका कारण है और उसका निराकरण यही सम्भव है। उसी तरह जानना जैसा कि बुद्ध ने अपने अन्तिम सन्देश में कहा था अप्पो दीपो भव् अर्थात अपने दीपक आप बनो।

क्या है हमारे वक्त़ का वह नज़ारा जिससे हम सभी रूबरू हैं, जिसने इस समाज के विचारशील तबकों को, प्रगतिउन्मुख लोगों को, इन्साफ एव अमन के चाहनेवालों को अन्दर तक बेचैन कर दिया है। दिलचस्प है कि वे लोग भी अन्दर ही अन्दर परेशां हैं, जिन्होंने अच्छे दिनों के इन्तज़ार में चुनावों के जरिए जबरदस्त उलटफेर को अंजाम दिया था; जो भारत के जनतंत्र की तवारीख के इस ऐतिहासिक मौके पर शायद बैरिकेड के उस तरफ खड़े थे, या कम से कम दिग्भ्रम की स्थिति में थे।

आज वह भी मन मसोस कर कह रहे हैं कि हम फिर एक बार छले गए हैं।
हमारे सामने उपस्थित इस परिदृश्य को किस तरह सूत्रबद्ध किया जा सकता है ?
सुविधा के लिए मैं इसे राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक आयामों में बांटने की कोशिश करूंगा।
मुमकिन है कि बातचीत के अन्त में हमें इस सूत्रीकरण में कुछ थोड़ा बहुत संशोधन करना पड़े, मगर चूंकि हम कई सारे मसलों पर बात करने वाले हैं और जाहिर है कि विभिन्न किस्म के तथ्यों या जानकारियों, सूचनाओं के कोलाहल में सभी के लिए बातचीत का सूत्र थामना मुश्किल हो, इसलिए मैं पहले ही निचोड़ अर्थात सारांश बयां कर रहा हूं।

हम एक ऐसे वक्त़ से गुजर रहे हैं जब

जनतंत्र बहुसंख्यकवाद में परिणत होता दिख रहा है।

नियंत्रित पूंजीवाद से नवउदारवादी पूंजीवाद की दिशा में रफ्तार तेज हो रही है, सरपट दौड़ते घोड़ों की तरह पूंजीवाद के रास्ते की तमाम बाधाएं दूर की जा रही है, और इन उन्मत घोड़ों की कदमों की नीचे विशाल शोषित-उत्पीडि़त जनों के जीने के तमाम अधिकारों को रौंदने की कोशिश हो रही है।

समुदाय बनाम व्यक्ति के चिरन्तन संघर्ष में फिलवक्त व्यक्ति कमजोर पड़ता दिख रहा है।

एक बात और स्पष्ट कर दूं, यह कोई अन्तिम सूत्रीकरण नहीं है। बातों का सिलसिला आगे बढ़े तो इसमें कई सारे आयाम जुड़ सकते हैं। संस्कृत का एक सुभाषित है वादे वादे जायते तत्वबोधः उसी तर्ज पर इस विचारमंथन से महज हलाहल ही नहीं बल्कि अमृत भी निकल सकता है, जिसकी आज सख्त जरूरत है भारतीय समाज को नयी संजीवनी देने के लिए।

4

कोई पूछ सकता है कि जनतंत्र के बहुसंख्यकवाद के परिणत होने को किस तरह समझा जा सकता है ?

पहले बहुसंख्यकवाद के हमारे लिए क्या मायने हैं ?

कहने के लिए यह लफ्ज जनतंत्र जैसा ही प्रतीत होता है, शायद इसी वजह से जनतंत्र से इसकी विभाजक रेखा बहुत धुंधली लग सकती है वैसे बारीकी में जाएं तो आप पाएंगे कि वह जनतंत्र को सर के बल खड़ा कर देता है। जनतंत्र इस मायने में गुणात्मक तौर पर अलग होता है क्योंकि वहां अल्पमत के अधिकारों के दमन की नहीं बल्कि सुरक्षा की गारंटी होती है। इसके बरअक्स बहुसंख्यकवाद अल्पमत को रौंद कर या कुचल कर या हाशिये पर डाल कर आगे बढ़ता है।

बहुसंख्यकवाद दरअसल पारम्पारिक राजनीतिक फलसफा या एजेण्डा है, जो दावा करता है कि आबादी के एक बहुमत को (जो कहीं धर्म, कहीं भाषा, सामाजिक तबका या चिन्हित करनेवाला अन्य कोई कारक) समाज में एक हद तक वरीयता पाने का अधिकार है और उसे ऐसे निर्णय लेने का भी अधिकार है जो शेष समाज को प्रभावित करते हों। गाज़ा में अपने ही नागरिकों पर हवाई हमले करनेवाला इजराइल - जो औपचारिक तौर पर एक जनतंत्र है, मगर जहां अरब अवाम दोयम दर्जे की स्थिति में है - हमारे सामने बहुसंख्यकवादी राज्य की एक मिसाल है।

हमारा मुल्क जब आज़ाद हुआ और जिन दिनों संविधान का निर्माण किया जा रहा था तो नवस्वाधीन देश के कर्णधारों को इस बात का पूरा एहसास था कि थोड़ी ढील दी गयी तो जनतंत्र का रथ बहुसंख्यकवाद के रास्ते पर चल निकल सकता है। बंटवारे के चलते हुआ जबरदस्त हिंसाचार और उससे पैदा नफरत की भावना अभी मद्धिम नहीं हुई थी और इसीलिए मुल्क के पहले वजीरे आज़म जवाहरलाल नेहरू ने हमें आगाह किया था कि एक बहुधर्मीय देश में बहुमत के धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ा जा सकता है और अल्पसंख्यक की हर आवाज़ को राष्ट्र के खिलाफ द्रोह के तौर पर पेश किया जा सकता है, जिसके प्रति हमें सावधान रहना होगा। धर्म को राष्ट्र की बुनियाद मान कर अलग हुए पाकिस्तान की तर्ज पर हमारी सरहद के भीतर ऐसे ही राष्ट्र के निर्माण के लिए सक्रिय ताकतों को निशाने पर रखते हुए वह समझाते थे कि हमें स्वाधीन भारत से किसी हिन्दु पाकिस्तान को गढ़ना नहीं है बल्कि धर्मनिरपेक्ष आधारों पर देश का निर्माण करना है।

डा अम्बेडकर, संविधानसभा की आखरी बैठक में भाषण की चन्द पंक्तियां याद आ रही हैं, जिसमें उन्होंने साफ कहा था:
‘‘हम लोग अन्तर्विरोधों की एक नयी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हम समान होंगे और सामाजिक-आर्थिक जीवन में हम लोग असमानता का सामना करेंगे। राजनीति में हम एक व्यक्ति-एक वोट और एक व्यक्ति-एक मूल्य के सिद्धान्त को स्वीकार करेंगे। लेकिन हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में, हमारे मौजूदा सामाजिक आर्थिक ढांचे के चलते हम लोग एक लोग-एक मूल्य के सिद्धान्त को हमेशा खारिज करेंगे। कितने दिनों तक हम अन्तर्विरोधों का यह जीवन जी सकते हैं? कितने दिनों तक हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में बराबरी से इन्कार करते रहेंगे ।’’

अपनी बातों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा था: “On the social plane, we have an India based on the principles of graded inequality, which means elevation of some and degradation of others. On the economic plane, we have a society in which there are some who have immense wealth as against many who live in abject poverty.”
कहने का तात्पर्य स्वाधीन भारत के कर्णधार इस बात के प्रति स्पष्ट थे कि हमें एक व्यक्ति एक वोट वाले राजनीतिक लोकतंत्र से एक व्यक्ति एक मूल्य वाले सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में अपनी यात्रा आगे बढ़ानी है।  आज जब हम अपने इर्दगिर्द देखते हैं तो आज से ठीक 64 साल पहले देश को संविधान सौंपते वक्त जिस किस्म के भारत के निर्माण का तसव्वुर किया गया था, जिसकी कल्पना की गयी थी, उससे बिल्कुल अलहदा पसमंज़र फिलवक्त़ हमारे सामने है।

लोकसभा के लिए हाल में सम्पन्न चुनाव और नवगठित संसद इसकी एक छोटी बानगी प्रस्तुत करते हैं।
एक छोटा उदाहरण देना चाहूंगा आप सभी जानते ही हैं कि यह एक ऐसी संसद है जहां सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का सबसे कम प्रतिनिधित्व दिखता है और पहली दफा एक ऐसी पार्टी हुकूमत में आयी है, जिसके 272 सांसदों में से महज दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से हैं, और जोर देने वाली बात यह है कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का एक भी सदस्य उसमें नहीं है। वे आधिकारिक तौर पर ऐसी बात नहीं कह सकते, मगर उन्होंने अन्दर ही अन्दर मान लिया है कि मुल्क को जिस तरह वह ढालना चाहते हैं, उसके लिए उन्हें उनकी जरूरत तक नहीं है।

बात किसी को बहुत छोटी लग सकती है, मगर देखें तो बहुत बड़ी भी मालूम पड़ सकती है। पुणे की सड़क पर जब नमाज़ अता करके लौट रहे एक साफ्टवेयर इंजिनियर को अतिवादियों ने पीट कर मार डाला, जिसकी राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया हुई, मगर हुकूमत सम्भालनेवालों ने , उसके कर्णधारों ने-जो चुनावों के पहले अपने बयानों के जरिए, टिव्टर के जरिए- चौबीसों घण्टे मुखर दिखते थे, उन्होंने अपनी जुबां पर ताला लगाना ही मुनासिब समझा।
एक बहुधर्मीय समाज में एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल होने की लम्बी रवायत है। अभी ईद बीती है। आप ने गौर किया होगा कि सत्ताधारी पार्टी के उन लोगों ने भी उस टोपी को नहीं पहना - जिन्होंने पिछले साल पहनी थी।

कहीं न कहीं यह संकेत मिल रहा है कि आप के विश्व दृष्टिकोण में अन्य कहे गये समुदायों, समूहों के लिए कोई जगह नहीं भी हो, आप उन्हें सारतः दोयम दर्जे के नागरिक बनाना चाहते हों,  तो भी कोई बात नहीं, आप हम कहे जा सकनेवाले समुदाय को गोलबन्द करके सिंहासन पर बिल्कुल जनतांत्रिक रास्ते से आरूढ हो सकते हैं।

यह अकारण नहीं कि केन्द्र की हुकूमत सम्भाली जमात के लोगों के सहमना/सहोदर संगठनों के अगुआओं ने खुलेआम यह कहा है कि अल्पसंख्यकों को अपनी हैसियत में रहना चाहिए। अपने आप में ऐसी बातें अपराध हैं, धारा 153 ए के अन्तर्गत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में शुमार होती हैं, मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मगर क्या महज खास पार्टी को, संगठन विशेष को ही इस स्थिति के लिए एकमात्र जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ?  क्या अपने आप को धर्मनिरपेक्षता का अलम्बरदार कहलाने वाली जमातों की, संगठनों की इस स्थिति के निर्माण में कोई भूमिका नहीं है। यह कहना जबरदस्त भूल होगी।

मैं हाल में ही संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट का निचोड प्रस्तुत करना चाहूंगा:

अल्पसंख्यक कल्याण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का हाल पिछले दिनों संसद के सामने पेश हुआ। पता चला कि इस सिलसिले में आठ साल पहले शुरू की गयी प्रधानमंत्री की 15 सूत्रीय योजना के कई बिन्दुओं पर अभी काम भी नहीं शुरू हो सका है। इतना ही नहीं बल्कि कई राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में इसके लाभार्थियों की संख्या शून्य है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त निगम की ओर से इन योजनाओं के लिए आवंटित किए गए धन के आंकड़ों को आधार बना कर इस सम्बन्ध में सदन में जानकारी प्रस्तुत की गयी।
ध्यान रहे कि संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार की पहली पारी में तैयार की गयी सच्चर कमीशन की रिपोर्ट जब तक सामने नहीं आयी थीजिसने पहली दफा इस बात को सबूतों के आधार पर प्रमाणित किया कि अपने मुल्क में अल्पसंख्यक वंचना का अनुपात काफी ज्यादा है, तब तक कोई इस बात को मानने को भी तैयार नहीं था। रिपोर्ट के प्रकाशन का सकारात्मक नतीजा निकला कि केन्द्र सरकार को अल्पसंख्यक विकास के प्रति सक्रिय रूख अपनाना पड़ा। अब जबकि इसे शुरू हुए कुछ समय बीत गया है, तो जो तस्वीर उभरती है वह किसी भी मायने में उत्साहित करनेवाली नहीं है, आंकड़े यही बताते हैं।

संसद में इस सम्बन्ध में प्रस्तुत रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक 9 राज्यों ने/केन्द्रशासित प्रदेशों ने वित्त वर्ष 2013-2014 में इस योजना के तहत किसी भी अल्पसंख्यक उद्यमी को कुछ भी सहायता उपलब्ध नहीं करायी, जबकि इस तरह की सहायता उपलब्ध कराना 15 सूत्रीय कार्यक्रम का हिस्सा रहा है।

गौरतलब है कि यह स्थिति महज राज्यों द्वारा विकास कार्यक्रमों को संचालित करने में ही नहीं दिखतीं।
तीन साल पहले यह ख़बर आयी थी कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद अल्पसंख्यकों को कर्जा मुहैया कराने में बैंक बहुत आनाकानी करते हैं। बैंकिंग लोकपाल कार्यालय में तथा सम्बधित अधिकारियों के यहां ऐसे तमाम केस दर्ज है जिसमें कर्जा देने में कोताही बरतने के मामले उजागर हुए हैं। इस सिलसिले में सभी प्रमुख बैंकों के अध्यक्षों एवं प्रबन्ध निदेशकों के साथ वित्त मंत्रालय द्वारा एक उच्चस्तरीय बैठक का इसीलिए आयोजन किया गया था ताकि वित्तीय समावेशन की सरकारी घोषणाओं एवं वास्तविक हकीकत के बीच व्याप्त अन्तराल की पड़ताल की जा सके। इतना ही नहीं उन्हीं दिनों राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के हवाले से यह विचलित करने वाला तथ्य उजागर हुआ था कि शेडयूल्ड कमर्शियल बैंकों द्वारा खाता खोलने को लेकर भी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ देश के पैमाने पर काफी आनाकानी की जाती है। अल्पसंख्यकों के खाते खोलने में की जा रही ढिलाई की सबसे अधिक मार छात्रों पर पड़ी थी।

इसे आप संयोग कह सकते हैं कि संसद में प्रस्तुत उपरोक्त रिपोर्ट के महज तीन दिन पहले देश के तीन राज्यों - महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु - के डायरेक्टर जनरल आफ पुलिस तथा इंटेलिजेन्स ब्युरो के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा मिल कर तैयार की गयी एक आन्तरिक रिपोर्ट के अंश अख़बारों में प्रकाशित हुए थे, जिन्होंने पुलिस बल में अल्पसंख्यकों के प्रति व्याप्त जबरदस्त पूर्वाग्रह का खुलासा किया था और यह भी कहा था कि अगर इसे जल्द ठीक नहीं किया गया तो मुल्क की आन्तरिक सुरक्षा के लिए इसके खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। ध्यान रहे कि प्रस्तुत रिपोर्ट एक तरह से पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों केा देश के विभिन्न हिस्सों से मिली सूचनाओं का सारांश एवं संकलन मात्र है। इसमें समुदाय के साथ पुलिस की अंतःक्रिया, समुदाय के नेताओं के उद्गार और उनके द्वारा प्रकाशित लेखों पर भी गौर किया गया है। रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि पुलिस एवं अल्पसंख्यक समुदाय के बीच के अन्तराल को पाटा जाए, उनके बीच अंतःक्रिया बढ़ायी जाए, साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए स्टेण्डर्ड आपरेटिंग प्रोसिजर्स विकसित की जाए” 

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर हम जनतंत्र में समावेशी विकास को जरूरी मानते हैं, अगर हम संविधान की उस धारा को सही ठहराते हैं जिसने जाति, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि सभी आधारों पर भेदभाव समाप्ति का ऐलान किया और हक़ीकत में अपने आप को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहां अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर ऐलान और हक़ीकत के बीच अन्तराल ज्यादा बड़ा है, तो हम इस आरोप से कैसे बच सकते हैं कि हमारी स्लेट बिल्कुल साफ है। अपने मौनों से, अपनी भूलों से, अपनी समझदारीगत कमजोरियों से क्या हम भी कहीं न कहीं इस प्रक्रिया को फैसिलिटेट नहीं करते रहे हैं।

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इसे एक विचित्र संयोग कह सकते हैं कि अगर हम अपने अगल बगल के मुल्कों पर, दक्षिण एशिया के इस हिस्से पर निगाह डालें तो कोई अलग तस्वीर नज़र नहीं आती। ऐसी ही ताकतें हावी होती दिख रही हैं, जिनके चिन्तन में अन्य का स्थान दोयम हैं।

अगर 40 के दशक के उत्तरार्द्ध में उपनिवेशवादी बंधनों से मुक्त होकर स्वाधीन होने का नारा बुलन्द हुआ था तो 21 वीं सदी की दूसरी दहाई सियासत में बहुसंख्यकवाद के उभार का गवाह बनी हैं। एक दिन भी नहीं बीतता जब हम पीडि़त समुदायों पर हो रहे हमलों के बारे में नहीं सुनते।

दक्षिण एशिया के इस परिदृश्य की विडम्बना यही दिखती है कि एक स्थान का पीड़ित समुदाय दूसरे इलाके में उत्पीड़क समुदाय में रूपान्तरित होता दिखता है। कुछ समय पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि महात्मा बुद्ध के सिद्धान्त के स्वयंभू रक्षक बर्मा के बिन लादेन में रूपान्तरित होते दिखेंगे। मुमकिन है कि आप सभी ने गार्डियन में प्रकाशित या टाईम में प्रकाशित उस स्टोरी को पढ़ा हो जिसका फोकस विराथू नामक बौद्ध भिक्खु पर था, जो 2,500 बौद्ध भिक्खुओं के एक मठ का मुखिया है और जिसके प्रवचनों ने अतिवादी बौद्धों को मुस्लिम इलाकों पर हमले करने के लिए उकसाया है। बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा जिन पर बहुसंख्यकवादी बौद्धों द्वारा जबरदस्त जुल्म ढाये जा रहे हैं सभी के सामने है।

बर्मा की सीमा को लांघिये, बांगलादेश पहुंचिये और आप बिल्कुल अलग नज़ारे से रूबरू होते हैं। यहां चकमा समुदाय - जो बौद्ध हैं, हिन्दू और अहमदिया- जो मुसलमानों का ही एक सम्प्रदाय है - वे सभी इस्लामिक अतिवादियों के निशाने पर दिखते हैं।सार्क प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा मालदीव भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ता दिखता है। श्रीलंका जो तमिल विद्रोहियों की सरगर्मियों के चलते दशकों तक सूर्खियों में रहा, वह इन दिनों सिंहल बौद्ध अतिवादियों की गतिविधियों के चलते चर्चा में रहता है, जो वहां की सत्ताधारी तबकों के सहयोग से सक्रिय दिखते हैं। कुख्यात बोडू बाला सेना के बारे में समाचार मिलते हैं कि किस तरह वह मुस्लिम प्रतिष्ठानों पर हमले करती है, ‘पवित्र इलाकों से मस्जिदों तथा अन्य धर्मों के प्रार्थनास्थलों को विस्थापित करने का निर्देश देती है, यहां तक कि उसने मुसलमानों के लिए धार्मिक कारणों से प्रिय हलाल मीट को बेचने पर भी कई स्थानों पर रोक लगायी है। बर्मा की तरह यहां पर भी मुस्लिम विरोधी खूनी मुहिम की अगुआई बौद्ध भिक्खु करते दिखते हैं।

अभी दो रोज पहले पाकिस्तान से ख़बर आयी थी कि उग्र भीड़ ने अहमदिया समुदाय से जुड़ी दादी और उसकी दो पोतियों को पीट कर मार डाला। वजह थी एक अफवाह कि किसी अहमदिया युवक ने फेसबुक पर कोई पोस्ट किया, जिसे ईशनिन्दा कहा जा सकता है। इतना ही नहीं भीड़ ने अहमदिया समुदाय की बस्ती को जला डाला और कइयों को घायल किया। कानून एवं सुव्यवस्था की रखवाली कही जानेवाली पुलिस खामोश बैठी रही। अख़बार में यही आया कि अगर ऐसा कोई आपत्तिजनक पोस्ट नहीं किया गया होता तो भीड़ बेकाबू नहीं होती। कुल मिला कर भीड़ को, हमलावरों को छूट और पीड़ित को ही दोषी ठहराना। किसी ने बताया कि उधर उन निरपराधों को जिन्दा जलाया जा रहा था, उनके मकानों को आग लगायी गयी थी और कैमरे के सामने उन्मादी भीड़ नाच रही थी, गोया उन्होंने कोई बड़ी फतह की हो।

धर्म भी मनुष्य को कितना अंधा एवं असम्वेदनशील और क्रूर बना सकता है, उसका सजीव प्रसारण लोगों के घरों में हो रहा था।
पाकिस्तान में आए दिन ऐसी घटनाएं सुनायी देती रहती हैं, कभी किसी सूफी मज़ार पर कोई आत्मघाती पहुंच कर बम उड़ा देता है तो कभी हजारा समुदाय के लोगों को बस से खींच कर मारा जाता है तो कभी लाहौर के शिया न्यायाधीशों को मारने की धमकी दी जाती है, इस आपाधापी में आप ने शायद इस बात पर गौर नहीं किया होगा कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुल्क है, जहां अहमदिया समुदाय के लोगों को गैरइस्लामिक घोषित किया गया है, वह अपने प्रार्थनास्थल को मस्जिद नहीं कह सकते, कुल मिला कर उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है और यह सब उस मुल्क के बढ़ते इस्लामीकरण का नतीजा है, जिसके चलते न केवल हिन्दुओं, अहमदियाओं और ईसाइयों पर बल्कि शिया मुसलमानों पर भी हमले होते दिखते हैं। एक वक्त़ था जब पाकिस्तान में प्रचलित इस्लाम अपनी सूफी विरासत का सम्मान करता था, मगर स्थितियां इस मुका़म तक पहुंची है कि ऐसी सभी सूफी परम्पराएं अब निरन्तर हमले का शिकार हो रही हैं। जाने माने पाकिस्तानी विद्धान एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज हुदभाय इसे पाकिस्तान का सौदीकरण या वहाबीकरण कहते हैं।

जैसा कि हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र कहलानेवाला भारत भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है, आज़ादी के बाद जिसका साम्प्रदायिक दंगों का लम्बा चौड़ा इतिहास है, इसके कई मुकाम हैं, 1983 का असम के नेल्ली का कतलेआम है जब कुछ घंटों के अन्दर आधिकारिक तौर पर एक हजार अल्पसंख्यक मारे गए थे, जब 1984 में सिख निशाने पर थे और 1992-2002 तो है ही, इधर बीच नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध से धर्मांतरण के नाम पर ईसाई भी निशाने पर आने लगे हैं। इन दंगों या जनसंहारों का एक साझापन यही है कि किसी भी मामले में न्याय नहीं मिल सका है, छिटपुट प्यादों को सज़ा मिली हैं, मगर असली मास्टरमाइंड कभी दंडित नहीं किए जा सके हैं, उल्टे ऐसे रक्तरंजित आयोजनों से वह सत्ता की कुर्सियों पर अपनी दावेदारी मजबूत करते दिखे हैं।

अगर जनतंत्र है, जहां औपचारिक तौर पर अल्पमत के विचारों की सुरक्षा की गारंटी है, इसके बावजूद ऐसे हालात क्यों बने हैं ? आप हर जगह पर गौर करेंगे कि अन्य समुदाय - जिसे हमले का निशाना बनाया जा रहा है- उसी को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

एक क्षण के लिए पश्चिमी देशों में मौजूद जनतंत्र पर गौर करें। वहां के समाजों को देखें। क्या उपरोक्त लेखित घटनाएं या एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय पर आक्रमण के किस्से वहां से सुनाई देते हैं ? 9/11 के बाद जबकि आतंकियों ने अमेरिका को निशाना बनाया था, हमने अमेरिकी समाज के अन्दर ऐसी व्यापक हिंसा नहीं देखी - जैसी कि इंदिरा गांधी की हत्या पर या गोधरा के बहाने भारत के शहरों में दिखी थीं।

कहने का तात्पर्य हमारे यहां जनतंत्र है मगर वह अभी भी औपचारिक अवस्था में है उसके वास्तविक/सबस्टेन्टिव बनने में अभी काफी सफर बाकी है और जिस तरह आस्था की दुहाई देते हुए या पहचान के नाम पर लोग, समुदाय एक दूसरे से लड़ने के लिए आमादा दिखते हैं, उसमें यही प्रतीत होता है कि अधिक वक्त़ जाया होगा।

पश्चिमी देशों के राजनीतिक स्टैण्ड को लेकर हमारे जो भी एतराज हों, मगर हम देख सकते हैं कि वहां जनतंत्रा - तंत्रा के तौरपर अर्थात संसद, विधानसभा, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा उसके नीचे की मशीनरी के तौर पर ही नहीं- बल्कि जन के बीच एक मूल्य के तौर पर स्थापित हुआ है।

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में तंत्र भले ही डेमोक्रेसी का हो, मगर जन अभी पीछे ही है।
स्पष्ट है कि जनतंत्रा को गहरा करने का सफर अभी काफी पूरा करना है और उसके लिए बेहद जरूरी है कि ऐसे शासन का निर्माण हो जहां धर्म और राजनीति में स्पष्ट फर्क हो। राज्य की धर्मनिरपेक्षता और नागरिक समाज का धर्मनिरपेक्षताकरण अवश्यम्भावी हो।

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इस सिलसिले में अपने यहां का एक ताज़ा उदाहरण पेश करना चाहूंगा।

हो सकता है कि आप ने सुना हो कि आनेवाले दिनों में मांसाहारी पदार्थ बेचना और बनाना सूबा गुजरात में ‘‘समाजविरोधी’’ गतिविधि में शुमार किया जाएगा ? जैन लोगों के लिए पवित्र कहे जानेवाले नगर पलिटाना को शाकाहारी घोषित करने की अपनी मांग को लेकर भूख हड़ताल कर रहे जैन साधुओं की यही मांग रही है। याद रहे कि जैन साधुओं की भूख हड़ताल के बाद सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर आन्दोलनकारी साधुओं से मिले काटेज उद्योग के राज्यमंत्री ताराचन्द छेड़ा ने यही ऐलान किया है कि पलिटाना नगर को, ‘‘शाकाहारी इलाका घोषित करने का निर्णय लिया गया है।

एक लाख आबादी वाले इस नगर की 25 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इतना ही नहीं स्थानीय सरकारी अधिकारी बताते हैं कि नगर की चालीस फीसदी आबादी मांसाहारी है। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं कोली जैसे हिन्दू समुदाय भी मांसाहारी हैं। याद रहे कि कुछ समय पहले गुजरात की पलीटाना म्युनिसिपल कमेटी ने जैन धार्मिक नेताओं के दबाव में आकर अपनी आम सभा में यह प्रस्ताव पारित किया कि म्युनिसिपालिटी की सीमा के भीतर मांस और अन्य गैरशाकाहारी भोजन - जिनमें अंडे भी शामिल किए गए हैं - के विक्रय पर रोक लगायी जाएगी। जानकारों के मुताबिक यह निर्णय जैनियों के राजनीतिक दबाव के तहत लिया गया जो राज्य में काफी प्रभावशाली माने जाते हैं और सत्ताधारी पार्टी को भरपूर चन्दा देते है। इस मसले को लेकर अल्पसंख्यकों का डर वाजिब है कि उन्हें बकरीद जैसे त्यौहार पर भी जानवर को जबह करने की अनुमति नहीं होगी, जो उनका धार्मिक कर्तव्य है।

अपने अपने पवित्र कहे जानेवाले नगरों/क्षेत्रों को सरकार की तरफ से भी वही दर्जा दिलाने की यह पहली मिसाल नहीं है। अभी पिछले साल की ही बात है जब सूबा आंध्र प्रदेश की तिरूमला पहाडि़यों की तलहटी में थोंडावडा के पास तिरूपति मन्दिर से तेरह किलोमीटर दूर बन रही हीरा इण्टरनेशनल इस्लामिक युनिवर्सिटी को बिल्कुल अलग ढंग के विरोध का सामना करना पड़ा था। गौरतलब है कि हीरा ग्रुप जो एक ग्लोबल फार्चुन कम्पनी है जो कमोडिटीज तथा शैक्षिक व्यवसाय में भी मुब्तिला है, उसके तहत मुस्लिम महिलाओं के लिए इस कालेज का निर्माण किया जा रहा है। हिन्दु साधुओं के एक हिस्से ने इलाके की पवित्राता की दुहाई देते हुए इस निर्माणाधीन संस्थान को वहां से हटाने की मांग की थी। ‘‘सात पहाडि़यों की पवित्राता की रक्षा’’ के नाम पर तिरूमला तिरूपति पवित्रता संरक्षण वेदिके नाम से एक साझा मंच के बैनर तले हिन्दु गर्जना नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। विशाखापटटनम स्थित सारदा पीठम के किन्हीं स्वरूपानन्देन्द्र सरस्वती ने यह ऐलान तक किया था कि इस निर्माण को हटाने के लिए वह श्रीवरी दाण्डू अर्थात खुदा की सेना का गठन करेंगे।
रेखांकित करने वाली बात यह है कि इलाका विशेष की पवित्रता की दुहाई देते हुए अल्पसंख्यकों को उनके सांस्कृतिक, मानवीय अधिकारों से वंचित करने की घटनाओं का सिलसिला दक्षिण एशिया के इस हिस्से में ही जोर पकड़ता दिख रहा है।

अपने मुल्क के तमिलों के आत्मनिर्णय के अधिकार को कुचलने के लिए युद्ध अपराधों के विवादों में घिरे पड़ोसी मुल्क श्रीलंका में डम्बुल्ला नामक स्थान पर बनी मस्जिद एवं मंदिर को पवित्र बौद्ध भूमि का हवाला देते हुए हटा दिया गया था। पहले वहां बौद्ध भिक्खुओं की अगुआई में हुडदंगियों ने हमला किया और दावा किया कि यह एक गैरकानूनी निर्माण है। डम्बुल्ला खैरया जुम्मा मस्जिद 60 साल से पुरानी है और मस्जिद के ट्रस्टियों के पास उसके निर्माण को लेकर कानूनी दस्तावेज भी मौजूद थे, वही हाल मन्दिर का भी था। मगर इन प्रमाणों से इन बौद्ध भिक्खुओं की अगुआई में पहुंचे सिंहलियों को कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने यही दावा किया कि दोनों पवित्र बौद्ध भूमि में बने हैं, इसलिए उन्हें हटना ही होगा।

जिन दिनों पंजाब में अतिवादी सिख नेता भिण्डरावाले की गतिविधियों ने जोर पकड़ा था, उन दिनों उनकी तरफ से इसी किस्म की आचारसंहिता लागू करवाने की बात की जा रही थी। स्वर्णमन्दिर जहां स्थित है उस अमृतसर में तथा सिखों के लिए पवित्र अन्य स्थानों पर खाने-पीने की किस तरह की चीजें बिक सकती है या नहीं बिक सकती हैं इसके बारे में फर्मान भी उनकी ओर से जारी हुए थे। पड़ोसी सूबा मध्यप्रदेश में जब मध्य प्रदेश में भाजपा की तरफ से उमा भारती मुख्यमंत्री बनी थी, (2003) तब अमरकंटक तथा अन्य धार्मिक नगरों में मांस-मछली आदि ही नहीं बल्कि अंडे के बिक्री एवम सेवन पर पाबन्दी लगा दी गयी थी। उसी वक्त यह प्रश्न उठा था कि किस तरह एक ही तीर से न केवल अहिन्दुओं को बल्कि हिन्दु धर्म को माननेवालों के बहुविध दायरे पर अल्पमत वर्ण हिन्दुओं का एजेण्डा लादा जा रहा है। सभी जानते हैं कि हिन्दुओं का बेहद छोटा सा अल्पमत पूर्णतः शाकाहारी है और व्यापक बहुमत मांसाहार करता है, अण्डों का सेवन करता है।

अगर कल्पना करें हमारे मुल्क में पलीटाना माडल को या आंध्र प्रदेश माडल को जगह जगह लागू किया जाएगा तो उन्हीं तर्क के आधार पर कहीं अल्पमत में रहनेवाले हिन्दुओं के लिए, कहीं अल्पमत में रहनेवाले सिखों के लिए या ईसाइयों या अन्य धर्मावलम्बियों के लिए संविधान प्रदत्त अपने आस्था के अधिकार पर अमल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

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प्रस्तुत बहस में जबकि हम औपचारिक जनतंत्र के वास्तविक जनतंत्र बनने के रास्ते की बाधाओं पर बात कर रहे हैं - और उसी फ्रेमवर्क में बहुसंख्यकवाद के खतरे से रूबरू हैं - तो यहां पर यह सोचना भी जरूरी है कि क्या इसमें निर्णायक भूमिका में राजनीतिक ताकतें ही हैं या अन्य कारक भी हैं जो इस सिलसिले को प्रभावित करते हैं।
आखिर पूंजी की भूमिका को, पैसे के रोल को हम कहां सिचुएट कर सकते हैं।

विडम्बना यही कही जा सकती है कि ढांचा ऐसा है कि पूंजी की भूमिका को खुल्लमखुल्ला कोई प्रश्नांकित नहीं करता, उसे प्रदत्त कारक मान कर चला जाता है। एक छोटा उदाहरण चुनावों की खर्चों की सीमा का है। विगत लगभग दो दशक से भारत के अन्दर चुनाव आयोग की चुस्ती की तारीफ होती रही है, पोस्टर-बैनर लगाने से लेकर अन्य तरीकों पर उसके द्वारा तैयार आचार संहिता मानने के लिए सभी को तैयार रहना पड़ता है। अगर आप ने दी हुई सीमा के बाहर जाकर खर्चे किए और इस बात को आप के विपक्षी साबित कर सके तो आप का चुनाव खारिज हो सकता है। मगर वहीं प्रत्याशी की पार्टी कितना खर्च कर रही है, कहां से पैसे जुटा रही है, इस पर कोई अंकुश नहीं है।

जैसा कि हम लोगों ने बीते लोकसभा चुनाव में देखा, जिसमें सभी पार्टियों ने अपने अपने हिसाब से खर्चे किए, मगर भाजपा इसमें शीर्ष पर रही, उसने कांग्रेस को पछाड़ दिया। एक आकलन के हिसाब से उसने चार हजार करोड़ रूपए प्रचार में खर्च किए। निश्चित ही ऐसे पैसे का बड़ा हिस्सा कार्पोरेट घरानों से ही आता है। चुनाव जितने के बाद  पार्टी को ऐसी नीतियां बनानी पड़ती हैं कि कार्पोरेट घराने खुश रहें।

उदाहरणार्थ, बैंकों के नान परफार्मिंग एसेटस के मसले को देखें। आंकड़े बताते हैं और इस सिलसिले में बैंकों के कर्मचारियों के संगठनों ने बताया भी है कि उसका 90 फीसदी बड़े कार्पोरेट घरानों की वजह से होता है। कुछ समय बाद बैंक इस खराब कर्जे को भुल कर नयी शुरूआत करती है, कल्पना करें कि एक छोटा किसान या श्रमिक छोटा मोटा कर्जा ले और चुका न सके तो उस पर दबाव डालने के लिए रवेन्यु महकमे के लोग अपनी टेम्पररी जेल में भी रखते हैं, वहीं बड़े कर्जदारों को- जिन्होंने बैंक को नुकसान पहुंचाया- उनके लिए फिर नया कर्जा देने की भी तैयारी रहती है।

उधर छोटा मोटा कर्जा न चुकाने के चलते किसान आत्महत्या कर रहे हैंवर्ष 1995 से अभी तक 2,70,940 किसानों ने आत्महत्या की है, जैसा कि नेशनल क्राइम्स रेकार्ड ब्युरो कहता है। औसतन हर रोज 46 किसान 2001 से आत्महत्या कर रहे हैं, लगभग आधे घंटे में एक किसान अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहा है। अगर यह बैठक तीन घण्टा चलती है, तब तक देश के अलग अलग हिस्सों में छह किसान मौत को गले लगा चुके होंगे।

हाल के सांख्यिकीय अनुसन्धान के आंकड़ों के मुताबिक जिन इलाकों में अधिक आत्महत्यायें दिखती हैं और जिन इलाकों में गरीब/विपन्न किसान ऐसी फसलों को उगाने की कोशिश में मुब्तिला हैंजिन पर बाजार की ऊपर नीचे होनेवाली कीमतों का जबरदस्त असर होता है, इनमें गहरा सम्बन्ध है। भारत सरकार ने मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की दिशा में जो कदम बढ़ाए हैं, यह उसी का नतीजा है।

नवउदारवादी पूंजीवाद का यह माडल है, जहां बाजारशक्तियों को खुली छूट मिली है, जो गैरबराबरी को बढ़ावा दे रहा है और जनतंत्र का संकुचन कर रहा है।
इधर बीच थामस पिकेटी नामक अर्थशास्त्री की एक किताब बहुत चर्चित हुई है जिसका शीर्षक है कैपिटल इन द टवेन्टी फस्र्ट सेंचुरी जो दुनिया में बढ़ती गैरबराबरी पर निगाह डालती है। किताब लिखनेवाले पिकेटी कोई वामपंथी नहीं हैं, मगर हमारे समय के पूंजीवाद का जो चित्रण वह प्रस्तुत कर रहे हैं, वह काफी वस्तुनिष्ठ है।

किताब के मुताबिक दुनिया में बढ़ती असमानता की स्थिति यह है कि उसकी 7.2 बिलियन आबादी में से लगभग आधी आबादी दो डालर प्रति दिन पर गुजारा करने के लिए अभिशप्त है, जो एक तरह से विश्व बैंक द्वारा तय गरीबी रेखा की सीमा है। इनका अधिकांश भारत, चीन और सबसहारन अफ्रीका के झोपडपट्टियों और गांवों में रहता है जहां की 48 फीसदी आबादी विश्व बैंक की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार 1.25 डालर प्रति दिन पर गुजारा करती है। बकौल नोम चोमस्की गैरबराबरी ऐतिहासिक उंचाइयों पर पहुंची है। आक्सफैम नामक संस्था की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की लगभग आधी सम्पदा पर आबादी के महज एक फीसदी का कब्जा है। दुनिया की एक फीसदी धनी आबादी की सम्पदा 110 ट्रिलियन डालर है, जो दुनिया की निचली आधी आबादी की कुल सम्पदा के 65 गुना होता है। दुनिया की निचली आधी आबादी - जिसकी संख्या 3.6 बिलियन है - के पास उतनी ही सम्पदा है जो सबसे धनी 85 लोगों के पास है।

काउण्टरपंच में प्रकाशित एक अन्य आलेख के मुताबिक गैरबराबरी के दूरगामी सामाजिक परिणाम होते हैं और वह जनतंत्र का क्षरण करती है। बेहद असमान समाजों में - कम असमान देशों के मुकाबले - शराब और नशीली दवाओं का शिकार लोग अधिक होते है, जहां अधिक अपराध, जीवन दर में कमी और साक्षरता की कम दरें नज़र आती हैं। इसके अलावा सम्पन्नों के लिए राजनीतिक प्रभाव/नियंत्रण एक बोनस की तरह होता है। अब जहां तक बाकी आबादी का सवाल है तो उन्हें वोट देने का अधिकार होता है, मगर सरकारी नीतियों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। प्रचंड गरीबी के साथ शिक्षा में कमी, शोषण सभी दिखता है, जो जनतंत्र को फीका कर देता है। 

एक दूसरी किताब भी लगभग उतनी ही चर्चित हुई है जो अमेरिकी लोकतंत्र पर निगाह डालती है और उसी बहाने हम दुनिया के अन्य लोकतंत्रों के अनुभवों को भी जांच सकते हैं। प्रिन्स्टन यूनिवर्सिटी के गिलेन्स और नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के पाजे द्वारा लिखी इस किताब का नाम है टेस्टिंग थियरीज आफ अमेरिकन पालिटिक्सः इलीटस्, इण्टरेस्ट ग्रुप्स एण्ड एवरेज सिटिजन्स इसमें लेखकद्वय जनतंत्र के प्लुटोक्रेसी अर्थात धनिकतंत्र बनने की प्रक्रिया को उद्घाटित करते हैं। पिकेटी की किताब की तरह गिलेन्स एवं पाजे नीतियों के असर को नापने के लिए विभिन्न कारकों को लेकर मौलिक एवं गहन सांख्यिकीय माडल्स का प्रयोग करते दिखते हैं।
काउण्टरपंच के एक अन्य लेख में (http://www.counterpunch.org/2014/05/02/apolitical-economy-democracy-and-dynasty) इस किताब पर विस्तृत चर्चा की गयी है, जिसका निचोड इस प्रकार है:

उनके निष्कर्ष इस आम धारणा से मेल नहीं खाते कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था सार्थक रूप में जनतांत्रिक हैं। आर्थिक अभिजातों और बिजनेस केन्द्रित हित समूहों की सेवा में मुब्तिला जनतंत्र में औसत नागरिक का सार्वजनिक नीति पर लगभग शून्य के करीब असर होता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि आम नागरिकों को नीति के तौर पर कुछ हासिल नहीं होता, कभी कभी उनके अनुकूल नीति बनती है, मगर तभी जब उनका चुनाव आर्थिक अभिजातों से मेल खाता हो।

लेखकद्वय के मुताबिक उनके निष्कर्ष ‘‘लोकरंजक’’ जनतंत्र अर्थात ‘‘पापुलिस्ट डेमोक्रेसी’’ के हिमायतियों को ‘‘नागवार’’ गुजर सकते हैं। गिलेन्स और पाजे का निष्कर्ष है कि ‘‘अमेरिकी अवाम के बहुमत का हमारी सरकार द्वारा अपनायी जानेवाली नीतियों पर मामूली प्रभाव होता है। ..अगर नीतिनिर्धारण का काम ताकतवर बिजनेस संगठनों और सम्पन्न अमेरिकियों के छोटे हिस्से के वर्चस्व में चलता हो तो एक जनतांत्रिक समाज होने के अमेरिका के दावों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है।

जनतंत्र के गहराने में राजनीतिक ताकतों की भूमिका और नवउदारवादी पूंजीवाद के अन्तर्गत हो रहे उसके संकुचन की बात करने के बाद हमें अपने समाज की भी बात करनी ही चाहिए, जिसने विभिन्न कारणों से जनतंत्र के वास्तविक (substantive) होने में दिक्कतें खड़ी की हैं।

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'Democracy in India is only a top-dressing on an Indian soil, which is essentially undemocratic.'
                                                                                                                 - Ambedkar

पिछले दिनों एक विचार चक्र के दौरान युवाओं के एक समूह के साथ बात करने का मौका मिला था, मैंने वहां मौजूद सहभागियों से यही जानना चाहा कि उनके हिसाब से जनतंत्र के सामने किन किन किस्म की चुनौतियों से हम आज रूबरू हैं ? आम तौर पर जैसा होता है पहले किसी ने जुबां नहीं खोली, मगर थोड़ी ही देर बाद अधिकतर लोगों ने अपनी बात रखी।

एक बेहद छोटे मगर मुखर अल्पमत का कहना था कि भारत जैसे पिछड़े मुल्क में, जो इतने जाति, समुदायों, सम्प्रदायों में बंटा है, वहां जनतंत्र कभी पनप नहीं सकता। उनके लिए इसे ठीक करने का एक ही नुस्खा था कि मुल्क की बागडोर – कम से कम दस साल के लिए- एक डिक्टेटर के हाथों में सौंप दो, सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान - जो हमारे साथ ही आज़ाद हुआ था - से लेकर अन्य कई मुल्कों का जिक्र किया, जिन्हें भारत की तरह तीसरी दुनिया के देशों में ही शुमार किया जा सकता है, जो लगभग उसी दौरान आज़ाद हुए, मगर जहां लोकतंत्र कभी जड़ जमा नहीं सका, और उनके साथ भारत की तुलना करने को कहा !

मगर वह मानने को तैयार नहीं थे। वह इसी बात की रट लगा रहे थे कि एक अदद डिक्टेटर क्यों समस्याओं को ठीक कर सकता है।
वैसे जानकार बता सकते हैं कि एक डिक्टेटर की यह ख्वाहिश समूचे भारतीय समाज के प्रबुद्ध हिस्से में विचित्र ढंग से फैली दिखती है, जिसका एक पैमाना हम हिटलर - जो अपनी कर्मभूमि में आज भी एक तरह से बहिष्कृत है - की आत्मकथा माइन काम्फ की भारत के बुकस्टालों या पटरी पर लगी दुकानों के बीच लोकप्रियता से देख सकते हैं।(http://indiaopines.com/popularity-of-mein-kampf-in-india/)

एक स्वीडिश राजदूत ने भारत यात्रा के बारे में अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहीं लिखा था कि उसे यह देख कर हैरानी होती है कि भारत में किताबों की प्रतिष्ठित दुकानों में भी हिटलर की आत्मकथा देखने को मिलती है, और पुस्तक विक्रेताओं के हिसाब से उनके खरीदार कम नहीं हो रहे हैं। एक तानाशाह के लिए मुन्तजि़र कहे जा सकने वाले लोगों में से एक तबका उन अभिजातों का दिखता है, जिन्हें यह बात सख्त़ नापसन्द है कि गरीब गुरबा या दमित-उत्पीडि़त तबके के लोग भी इन दिनों सियासत में दखल बना रहे हैं।

वे जो अदद डिक्टेटर के हिमायती थे, उन्हें छोड़ कर कइयों ने संस्थागत जनतंत्र बनाम  प्रत्यक्ष जनतंत्र की बात छेड़ी। उनका कहना था कि संसदीय व्यवस्था के रूप में हमारे यहां जो संस्थागत जनतंत्र साठ साल से आकार लिया है, वही समस्याओं की जड़ में है ; जिसमें सहभागी को पांच साल में या नियत समय में एक बार वोट डालने का और अपने शासक चुनने का अधिकार मिलता है, राज्य के रोजमर्रा के संचालन में, नीतिनिर्धारण में उसकी अप्रत्यक्ष भागीदारी ही बन पाती है।

उनका कहना था कि राज्यसत्ता के संचालन में लोगों की इस औपचारिक सी भागीदारी को समाप्त कर उसे अगर ठोस शक्ल देनी हो तो प्रत्यक्ष जनतंत्र बेहतर तरीका हो सकता है। इसके अन्तर्गत हर मोहल्ला अपना खुद का घोषणापत्र तय करेगा, शासन एवं विकास के हर पहलू पर पूरा नियंत्रण कायम करेगा, जहां लोग अपने भले के हिसाब से निर्णय लेंगे और समुदाय के जीवन में बसे सांस्कृतिक मूल्यों एवं नैतिक मानदण्डों की हिमायत करेगा और उन्हें व्यवहार में लाएगा।

मैंने उनसे यह समझने की कोशिश की सम्पत्ति, सत्ता एवं जाति, धर्म, नस्ल आदि के आधार पर बंटे एक विशाल समाज में, जहां अभी भी व्यक्ति के अधिकार की अहमियत पूरी तरह से स्थापित नहीं हो सकी है, जहां वह अगर अपने हिसाब से रहना चाहे, प्यार करना चाहे या जिन्दगी बसर करना चाहे तो उसे तमाम वर्जनाओं से गुजरना पड़ता है, जहां अपनी सन्तानें अगर अपनी मर्जी से शादी करना चाहें तो पंचायतों के फैसलों के नाम पर उनके मां बाप उन्हें खुद खत्म करते हों, या जहां हम और वे की भावना इतने स्तरों पर, इतनी दरारों पर उजागर होती हो और जहां उत्पीडि़त समुदायों को प्रताडित करने के लिए पुलिस बल पर आतंक मचाने या दंगा कराने की बात बहुत अजूबा न मालूम पड़ती हो, वहां पर उनका नुस्खा कैसे काम करेगा ? मेरी समझ से यह एक सख्त/स्ट्राग जनतंत्र की अवधारणा थी जिसमें राज्यसत्ता का विकेन्द्रीकरण किया गया हो और बेहद सक्रिय नागरिक स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के माध्यम से उसका संचालन करते हों।

कइयों ने उन तमाम बातों का जिक्र उन्होंने किया, जो उनके दैनंदिन जीवनानुभव पर आधारित थी। यह तमाम ऐसी परिघटनाएं, बातें थी जिनसे उनका रोज का साबिका पड़ता है या मीडिया के माध्यम से आए दिन उनके इर्दगिर्द बहस मुबाहिसा होता रहता है। उनके मुताबिक अगर जनतंत्र इन समस्याओं का समाधान कर सके तो वह सुचारू रूप से चल सकता है।

उनके बहुमत का यही मानना था कि अगर प्रणालियां ठीक से चलने लगें, कानून ठीक से काम करे तो इन चुनौतियों से निजात पायी जा सकती है। लुब्बेलुआब यही था कि जनतंत्र की प्रणाली - फिर चाहे न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो, विधायिका हो - ठीक से काम करने लगें तो सब कुछ बेहतर हो जाएगा। कहीं भी इस बात की ओर संकेत नहीं था कि एक पिछड़े समाज में जनतंत्र के आरोपण में और एक विकसित समाज में जनतंत्रा के आगमन में क्या कोई अन्तर हो सकता है या नहीं। और क्या ऐसी प्रणालियां सामाजिक बनावट की छाप से स्वतंत्र रह सकती हैं ?
निश्चित तौर पर ऐसी बातचीत की अपनी सीमाएं होती हैं, और यह बातचीत भी किसी खास निष्कर्ष तक पहुंचे बिना ही समाप्त हो गयी।

गौरतलब था कि किसी ने भी अपनी सामाजिक बनावट की पड़ताल की बात नहीं की थी। साम्प्रदायिक दंगों की बात चली थी, समाज में बढ़ते घेट्टोकरण की बात चली थी, जातिगत हिंसा या जेण्डरगत हिंसा की बढ़ती बर्बरता पर भी बहस चली थी। इनकी मौजूदगी से वह इत्तेफाक कर रहे थे, मगर उनके लिए ऐसी घटनाएं एबरेशन्स के तौर पर, विसंगतियों के तौर पर मौजूद थी, जिन्हें ठीक किया जा सकता था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभी मुख्यधारा में हावी उस प्रभुत्वशाली विमर्श के कायल थे कि भारतीय समाज मूलतः एक सहिष्णु समाज है और अगर चन्द तबकों के खिलाफ हिंसा का प्रगटीकरण होता है तो उसकी वजह नैमित्तिक होती है, उसकी कोई ढांचागत जड़ों को तलाशा नहीं जा सकता।

निश्चित तौर पर मैं उन युवाओं को दोष देना नहीं चाहता, वह उन्हीं बातों को दोहरा रहे थे, जो बातें समाज में अक्सर सुनने को मिलती हैं।
आखिर कौन सी ऐसी बातें हैं जो हमारे अपने समाज के बारे में कही जा सकती हैं, जो उसकी सामाजिक बनावट की विशिष्टता को रेखांकित करती हों।

विडम्बना यही है कि जहां एक तरह हिंसा सर्वव्यापी दिखती है, मगर यह बात सर्वमान्य नहीं है। इसके विपरीत लोगों को हमारी संस्कृति में सहिष्णुता की कथित महान परम्परा के गुणगान करने में संकोच नहीं होता और एक विषमतामूलक, श्रेणीबद्ध सामाजिक प्रणाली के अन्तर्गत जो रोजमर्रा की पाशविकता और सतत संगठित हिंसा दिखती है, उसकी पड़ताल करने की भी कोशिश नहीं होती। इस बात को भुला दिया जाता है कि यह एक ऐसा मुल्क है जो अहिंसा के सन्त की महानता की बात करता है, वहां एक किस्म की हिंसा को न केवल वैध कहा जाता है बल्कि उसे पवित्रता का भी दर्जा दिया जाता है। एक ऐसा समाज जहां लोगों का एक छोटा हिस्सा जो रक्त की शुद्धता और उच्च कुल में जनम का दावा करता हो, जिसे अपनी हरकतों के लिए दैवी स्वीकृति हासिल हो और जिसमें अन्यों के - मेहनतकश अवाम का विशाल हिस्सा, शूद्रों, अतिशूद्रों का - अमानवीयकरण करने का सिलसिला यथावत जारी रहता हो, कटघरे में खड़ा होने से बच निकलता है। इन विभिन्न उत्पीडि़त तबकों के खिलाफ हिंसा को आदिम काल से धार्मिक स्वीकृति मिलती रही है और आधुनिकता के आगमन ने भी व्यापक परिदृश्य में कोई तब्दीली नहीं की है।
एक हिन्दू पुरूष या स्त्री, जो कुछ भी वह करते हैं, वह धर्म का पालन कर रहे होते हैं। एक हिन्दू धार्मिक तरीके से खाना खाता है, पानी पीता है, धार्मिक तरीके से नहाता है या कपड़े पहनता है, धार्मिक तरीके से ही पैदा होता है, शादी करता है और मृत्यु के बाद जला दिया जाता है। उसके सभी काम पवित्र काम होते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष नज़रिये से वह काम कितने भी गलत क्यों न लगें, उसके लिए वह पापी नहीं होते क्योंकि उन्हें धर्म के द्वारा स्वीकृति मिली होती है। अगर कोई हिन्दू पर पाप करने का आरोप लगाता है, उसका जवाब होता है, ‘ अगर मैं पाप करता हूं, तो मैं धार्मिक तरीके से ही पाप करता हूं।

(द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ - डाक्टर भीमराव अम्बेडकर )

गौरतलब है कि ऐसी कई प्रथाओं एवं श्रेणीबद्धताओं का प्रभाव जिनकी जड़ हिन्दु धर्म में देखी जा सकती है, वह अन्य धर्मावलम्बियों के व्यवहार में भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध धर्म में जातिभेद - जिसकी कल्पना बाहर नहीं की जा सकती है उसका यहां के लोगों के जीवन विश्व में वजूद बना हुआ है। अपने आप परिवार भी जबरदस्त हिंसा का स्थान है। भारत एकमात्रा ऐसा मुल्क है जहां एक विधवा को अपने मृत पति की चिता पर जलाया जाता रहा है। अगर पहले नवजात बेटी को अधिक बर्बर तरीके से मारा जाता था आज की तारीख में माता पिता टेक्नोलोजी में आयी तरक्की के सहारे यौनकेन्द्रित गर्भपात का सहारा लेते हैं। यह अकारण नहीं है कि भारत एकमात्रा मुल्क है जहां अभी भी 330 लाख महिलाएं गायब हैं।

तीस साल का वक्त़ होने को है जब इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्तर पर सिखों को हमले का निशाना बनाया गया था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गणराज्य की राजधानी दिल्ली में एक हजार से अधिक निरपराध जलती टायरों को गले में डाल कर बर्बर ढंग से मारे गए। हर कोई जानता है कि वह कोई स्वतःस्फूर्त हिंसा नहीं थी। आज भले ही बहुत कम लोग उस रक्तरंजित दौर को याद करना चाहें मगर यह सच है कि उन दिनों समाज के प्रबुद्ध तबके के हिस्सों ने शासक पार्टी की शह पर अंजाम दी गयी इस हिंसा को औचित्य प्रदान किया था और उसे लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहा था। वर्ष 2002 में सूबा गुजरात में सत्ताधारी पार्टी की शह पर अंजाम दी गयी हिंसा को भी उसके अंजामकर्ताओं ने उसी तरह क्रिया-प्रतिक्रिया के आवरण में पेश किया था।

कई तरीके हो सकते हैं जिसके माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने भारत को प्रस्तुत किया जाता है, प्रोजेक्ट किया जाता है। कुछ लोगों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र है, जबकि बाकियों के लिए वह दुनिया की तेज गति से चल रही अर्थव्यवस्था है जिसका अब विश्व मंच पर आगमन हो चुका है। लेकिन शायद ही कोई हो यह कहता है कि वह जनअपराधों की भूमि है जहां ऐसे अपराधों के अंजामकर्ताओं को शायद ही सज़ा मिलती हो। जनमत को प्रभावित करने वाले लोग कहीं भी उस अपवित्र गठबन्धन की चर्चा नहीं करते हैं जो सियासतदानों, माफियागिरोहों और कानून एवं व्यवस्था के रखवालों के बीच उभरा है जहां जनअपराधों को अदृश्य करने की कला में महारत हासिल की गयी है और ऐसे जनअपराधों के निशाने पर - धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के लोग, सामाजिक श्रेणियों में सबसे नीचली कतार में बैठे लोग या देश के मेहनतकश - दिखते हैं।

क्या कोई इस बात पर यकीन कर सकता है कि 42 दलितों - जिनमें मुख्यतः महिलाएं और बच्चे शामिल थे - का आज़ाद हिन्दोस्तां का पहला कत्लेआम तमिलनाडु के तंजावुर जिले के किझेवनमन्नी में (1969) में सामने आया था जहां तथाकथित उंची जाति के भूस्वामियों ने इसे अंजाम दिया था, मगर सभी इस मामले में बेदाग बरी हुए क्योंकि अदालती फैसले में यह कहा गया कि इस बात से आसानी से यकीन नहीं किया जा सकता कि उंची जाति के यह लोग पैदल उस दलित बस्ती तक पहुंचे होंगे। गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में मजदूरों ने वहां हड़ताल की थी और अदालत में भले ही उन शोषितों को न्याय नहीं मिला होगा मगर वहां के संघर्षरत साथियों ने भूस्वामियों के हाथों मारे गए इन शहीदों की स्मृतियों को आज भी संजो कर रखा है, हर साल वहां 25 दिसम्बर को- जब यह घटना हुई थी - हजारों की तादाद में लोग जुटते हैं और चन्द रोज पहले यहां उनकी याद में एक स्मारक का भी निर्माण किया गया।

अगर हम स्वतंत्र भारत के 60 साला इतिहास पर सरसरी निगाह डालें तो यह बात साफ होती है कि चाहे किझेवनमन्नी, ना हाशिमपुरा (जब यू पी के मेरठ में दंगे के वातावरण में वहां के 42 मुसलमानों को प्रांतीय पुलिस ने सरे आम घर से निकाल कर भून दिया था 1986), ना बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बम्बई में शिवसेना जैसे संगठनों द्वारा प्रायोजित दंगों में मारे गए 1,800 लोग (जिनका बहुलांश अल्पसंख्यकों का था, 1992 और जिसको लेकर श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी है), ना ही राजस्थान के कुम्हेर में हुए दलितों के कत्लेआम (1993) और न ही अतिवादी तत्वों द्वारा किया गया कश्मीरी पंडितों के संहार (1990) जैसे तमाम मामलों में किसी को दंडित किया जा सका है। देश के विभिन्न हिस्सों में हुए ऐसे ही संहारों को लेकर ढेर सारे आंकड़े पेश किए जा सकते हैं।

और हम यह भी देखते हैं कि उत्तर पूर्व और कश्मीर जैसे इलाकों में, दशकों से कायम सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम जैसे दमनकारी कानूनों ने सुरक्षा बलों को एक ऐसा कवच प्रदान किया है कि मनगढंत वजहों से उनके द्वारा की जानेवाली मासूमों की हत्या अब आम बात हो गयी है। हम सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मणिुपर की फर्जी मुठभेड़ों को लेकर बनाए गए सन्तोष हेगडे कमीशन की हालिया रिपोर्ट पढ़ सकते हैं और जिन चुनिन्दा घटनाओं की जांच के लिए उन्हें कहा गया था उसका विवरण देख सकते हैं। बहुत कम लोग इस तथ्य को स्वीकारना चाहेंगे कि कश्मीर आज दुनिया का सबसे सैन्यीकृत इलाका है और विगत दो दशकों के दौरान वहां हजारों निरपराध मार दिए गए हैं।

आप यह जान कर भी विस्मित होंगे कि किस तरह ऐसे जनअपराधों को या मानवता के खिलाफ अपराधों को सत्ताधारी तबकों द्वारा औचित्य प्रदान किया जाता है या वैधता दी जाती है, जहां मुल्क का प्रधानमंत्री राजधानी में सिखों के कत्लेआम के बाद - जिसे उसकी पार्टी के सदस्यों ने ही अंजाम दिया - यह कहता मिले कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो जमीन हिलती ही है। या किसी राज्य का मुख्यमंत्री उसके अपने राज्य में मासूमों के कत्लेआम को न्यूटन के क्रिया प्रतिक्रिया के सिद्धान्त से औचित्य प्रदान करे।

ऐसे तमाम बुद्धिजीवी जो हमारी महान संस्कृति में निहित सहिष्णुता से सम्मोहित रहते हैं और उसकी समावेशिता का गुणगान करते रहते हैं, वह यह जान कर आश्चर्यचकित होंगे कि किस तरह आम जन, अमनपसन्द कहलाने वाले साधारण लोग रातों रात अपने ही पड़ोसियों के हत्यारों या बलात्कारियों में रूपान्तरित होने को तैयार रहते है और किस तरह इस समूचे हिंसाचार और उसकी उत्सवी सहभागिता के बाद वही लोग चुप्पी का षडयंत्र कायम कर लेते हैं। बिहार का भागलपुर इसकी एक मिसाल है - जहां 1989 के दंगों में आधिकारिक तौर पर एक हजार लोग मारे गए थे, जिनका बहुलांश मुसलमानों का था - जहां लोगाईं नामक गांव की घटना आज भी सिहरन पैदा करती है। दंगे में गांव के 116 मुसलमानों को मार दिया गया था और एक खेत मेंगाड़ दिया गया था और उस पर गोबी उगा दिया गया था।

निस्सन्देह अल्पसंख्यक अधिकारों के सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता के तौर पर हम राज्य और दक्षिणपंथी बहुसंख्यकवादी संगठनों को देख सकते हैं मगर क्या उसे सामाजिक वैधता नहीं होती। यह बात रेखांकित करनेवाली है कि एक ऐसे मुल्क में जहां अहिंसा के पुजारी की महानता का बखान करता रहता है, एक किस्म की हिंसा को न केवल वैध समझा जाता है बल्कि उसे पवित्रता का दर्जा भी हासिल है। दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य उत्पीडि़त तबकों के खिलाफ हिंसा को प्राचीन काल से धार्मिक वैधता हासिल होती रही है और आधुनिकता के आगमन ने इस व्यापक परिदृश्य को नहीं बदला है। भारत एकमात्रा ऐसा मुल्क कहलाता है जहां एक विधवा को अपने मृत पति की चिता पर जला दिया जाता रहा है। अगर पहले कोई नवजात बच्ची को बर्बर ढंग से ख़त्म किया जाता था आज टेक्नोलोजी के विकास के साथ इसमें परिवर्तन आया है और लोग यौनकेन्द्रित गर्भपात करवाते हैं। यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि आखिर क्यों भारत दुनिया का एकमात्रा मुल्क है जहां 3 करोड 30 लाख महिलाएं गायब हैं। रेखांकित करनेवाली बात यह है कि ऐसी तमाम प्रथाओं एवं सोपानक्रमों की छाप - जिनका उदगम हिन्दू धर्म में दिखता है - अन्य धर्मों पर भी नज़र आती है। इस्लाम, ईसाइयत या बौद्ध धर्म में जातिभेद की परिघटना - जिसकी बाहर कल्पना नहीं की जा सकती - वह यहां  मौजूद दिखती है।

इस परिदृश्य को बदलना होगा अगर भारत एक मानवीय समाज के तौर पर उभरना चाहता है। यह चुनौती हम सभी के सामने है। अगर इस उपमहाद्वीप के रहने वाले लोग यह संकल्प लें कि दुनिया का यह सबसे बड़ा जनतंत्र भविष्य में जन अपराधों की भूमि के तौर पर न जाना जाए तो यह काम जल्दी भी हो सकता है।

यहां एक सवाल उठना लाजिमी है कि जनसंहार को अंजाम देने वाले लोग क्या बीमार मस्तिष्क और परपीड़क होते हैं।अपनी बहुचर्चित किताब आईशमैन इन जेरूसलेम: ए रिपोर्ट आन द बॅनालिटी आफ इविल में जर्मन-अमेरिकी दार्शनिक हाना अरेन्डट इस प्रश्न का जवाब देने की कोशिश करती हैं। एक नात्सी सैन्य अधिकारी एडाल्फ आइशमैन जो हिटलर की हुकूमत में चली नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम के अग्रणी सूत्राधारों में से था, उस पर चले मुकदमे की चर्चा करते हुए वह बताती हैं कि किस तरह ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम देनेवाले अक्सर सामान्य, साधारण लोग होते हैं जो अपने काम को नौकरशाहाना दक्षता के साथ अंजाम देते हैं।

एक ऐसे समय में जबकि 2002 के स्याह दौर को - जब राज्य के कर्णधारों की अकर्मण्यता और संलिप्तता के चलते हजारों निरपराधों को जान से हाथ धोना पड़ा - और कुछ लाख लोग अपने मुल्क में ही शरणार्थी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हो चले हैं, को भुला देने की, उनका साफ सुथराकरण करने की कोशिशें तेज हो चली हैं, और विकास का एक ऐसा शगूफा खड़ा किया जा रहा है जिसके तले असहज करने वाले तमाम प्रश्न दफन हो जाएं तो इन सारे सवालों से रूबरू होने की जरूरत बनती है। और सबसे बढ़ कर उस सामाजिक बनावट को टार्गेट करने की, जहां ऐसी हिंसा की श्रेणीबद्धता को आए दिन वैधता प्रदान की जाती हो, उसे आमूलचूल बदलने के लिए नए उद्यम में जुट जाने की आवश्यकता बनती है।

जनतंत्र के बुनियादी सिद्धान्तों को बहुसंख्यकवाद के दहलीज पर समर्पित करने का जो औपचारिक आगाज़ हुआ है उसे हर सूरत में रोका जाना चाहिए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बहुमत के शासन के अलावा जनतंत्र का मतलब होता है, अल्पमत के जीवन के अधिकारों एवं मतों की सुरक्षा और अधिक महत्वपूर्ण, यह कानूनी सम्भावना कि आज का राजनीतिक अल्पमत भविष्य में चुनावी बहुमत हासिल करेगा और इस तरह शान्तिपूर्ण तरीके से व्यवस्था को बदल देगा।

यह वर्ष 2001 का था जब नार्वे में अफ्रीकी नार्वेजियन किशोर बेंजामिन हरमानसेन की नवनात्सी गिरोह ने हत्या की, जो उस मुल्क के इतिहास की पहली ऐसी हत्या थी। आगे जो कुछ हुआ उसकी यहां कल्पना करना भी सम्भव नहीं होगा। अगले ही दिन दसियों हजार नार्वे के निवासी राजधानी ओस्लो की सड़कों पर उतरे और उन्होंने किशोर को न्याय दिलाने की मांग की और इस विशाल प्रदर्शन की अगुआई नार्वे के प्रधानमंत्री जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने की जिन्होंने यही कहा: यह हमारा तरीका नहीं है ; अपने समाज में नस्लीय अपराधों के लिए कोई स्थान नहीं है।’’ एक साल के अन्दर पांच सदस्यीय पीठ ने दो हमलावरों को दोषी ठहराया और उन्हें 15 साल की सज़ा सुनायी।

9.

चालीस या पचास के दशक में दुनिया में जो आलम था, जिस तरह मेहनतकशों के संघर्ष तेज हो रहे थे, उपनिवेशवाद के खिलाफ स्वाधीनता की मांग बुलन्द करते हुए लड़ाइयां जीती जा रही थीं, उसी वक्त़ को देखते हुए शमशेर बहादुर सिंह ने सम्भवतः समय साम्यवादी की बात कही थी।

आज जब हम 21 वीं सदी की दूसरी दहाई के मध्य में प्रवेश कर रहे हैं, तो यह आसानी से देख सकते हैं कि हवाएं किस तरह उल्टी दिशा में बह रही हैं और समूची मानवता की प्रगति, समानता और न्याय का संघर्ष कहीं पीछे छूटता दिख रहा है।
उधर हालिया चुनावी उलटफेर ने इस चुनौती को और गहरा किया है।

मगर मैं मानता हूं कि यह किसी भी पार्टी को भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि उनके हाथों में हुकूमत की चाभी आ गयी है तो वह हमेशा के लिए उनकी हो गयी है। हिन्दोस्तां की अवाम बहुत सूझ बूझ से फैसले लेती रही है। आज अपने बहुमत पर इतराने वाले लोगों को 77” की जनता पार्टी की जीत को भी याद करना चाहिए, जब उत्तर भारत से अख़बारी भाषा में कहें तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ था और महज तीन साल बाद वह अपने बलबूते सत्ता में वापस लौटी थी। हमें 84” को भी याद रखना चाहिए। राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस को अभूतपूर्व जीत हासिल हुई थी, जैसी जीत सम्भवतः उनके नानाजी या माताजी को भी नहीं मिली थीं, मगर इसके बावजूद दो साल के अन्दर आलम यह बना कि मुल्क की फिजां बदलने लगी और 89” तक आते आते वही कांग्रेस सत्ता के गलियारे से बाहर हो गयी। हमें 2004को याद रखना चाहिए जब इंडिया शाइनिंग का नारा लगा कर तत्कालीन परिवारजन आत्ममुग्ध हुए जा रहे थे और यही अनुमान लगाए बैठे थे कि सत्ता में दोबारा वापसी तो तय है, मगर जनता ने ऐसा झटका दिया कि दस साल तक दरवाजे के बाहर ही रखा और इस अन्तराल में अपने आप को लौहपुरूष कहलवाने वाले शख्स ने पी एम इन वेटिंग अर्थात मुन्तजि़र प्रधानमंत्री के तौर पर एक तरह से विश्व रेकार्ड कायम कर लिया।

जो लोग भारत की साझी संस्कृति को इकहरी संस्कृति में तब्दील करना चाहते हैं, उन्हें देख कर मुझे गुस्सा भी आता है और हंसी भी आती है। गुस्सा इसलिए कि अपने मध्ययुगीन एजेण्डा को आगे बढ़ाने के लिए वह किस तरह समाज में आपसी नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं और हंसी इसलिए कि बात भारत को उसका गौरव बहाल करने की करते हैं, मगर वह कितना कम भारत को जानते हैं। शायद सावन के इन दृष्टिहीनों को नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन की बहुचर्चित किताब आर्गुमेण्टेटिव इंडियन भी पढ़नी चाहिए, जो उन्हें अन्य के हर प्रार्थनास्थल के नीचे कथित तौर पर दबे अपने प्रार्थनास्थल को ढूँढने की निरर्थक कवायद से दूर ले जा सकें और भारत के इतिहास की उन परम्पराओं से भी परिचित करा सकें, जिसकी तरफ उनका ध्यान कभी नहीं गया है। इसी किताब का एक छोटा सा उदाहरण देना समीचीन होगा, जहां अकबर बादशाह द्वारा फतेहपुरसिक्री में आयोजित शास्त्रार्थ के बारे में बताया गया है, जहां अन्य धार्मिक परम्पराओं के अलावा नास्तिक परम्परा से जुड़े विद्धानों की मौजूदगी का भी जिक्र है। सोचने का मसला है कि क्या यह नास्तिक परम्परा अचानक अकबर के काल में नमूदार हुई होगी या पहले से चली आ रही होगी ?

मैं मार्क्स का विद्यार्थी हूं, मगर यहां आप के साथ समाजवादी इन्कलाब की जरूरत एवं प्रासंगिकता पर बात करने के लिए नहीं पहुंचा हूं, उस प्रसंग पर फिर कभी हम बात कर सकते हैं। जिस तरह के हालात यहां बन रहे हैं, जबकि वास्तविक जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई गतिरोध का शिकार हुई दिखती है, उसी के बारे में चन्द बातें रखने के लिए यहां पहुंचा हूं। 

इसमें कोई दोराय नहीं कि वर्तमान समय में हमारे आप के जैसे लोग जो कलम के इलाके में, मीडिया के क्षेत्र में अपना जौहर दिखा रहे हैं, उनकी जिम्मेदारी बढ़ती है, क्योंकि वह उन तमाम चुनौतियों का पूर्वानुमान भी करने की स्थिति में है, जिसकी तरफ अभी बहुत कम लोगों का ध्यान गया है। मगर कइयों की हालत काफी खराब दिखती है। जनता दल (यू) के एक सांसद ने पिछले दिनों संसद की पटल पर ऐसे जनों की तरफ इशारा करते हुए कहा था

कुछ इस कदर बदहवास हुए आंधियों से लोग
जो पेड़ खोखले थे, उन्हीं से लिपट गए

आज़ादी के वक्त़ धर्मनिरपेक्षता और जनतंत्रा की दिशा में उठे सधे कदम - जो यहां 2014 तक आते आते लड़खड़ाते दिखते हैं - उसी की तुलना हम विश्व इतिहास के एक दूसरे मुक़ाम से कर सकते हैं, जब 1989 में पूर्वी यूरोप की पीपुल्स डेमोक्रेसीज में हुए उलटफेर और बाद में सोविएत संघ के विघटन के बाद समाजवाद की पूरी संकल्पना ही विवादों में आती दिखी थी। अगर नब्बे के दशक ने समाजवाद के तमाम हिमायतियों को अपने रास्ते से डिगने का अवसर दिया, उन्हें जबरदस्त विभ्रम, दिग्भ्रम की स्थिति में डाला, आज एक तरह से वही हालत हम धर्मनिरपेक्षता एवं जनतंत्र के हिमायतियों के एक हिस्से की देख सकते हैं, जिन्हें अचानक धर्मनिरपेक्षता की समझदारी एवं उसके व्यवहार पर ही नए शंकाएं घिरने लगी हैं।

विचारों की इस लड़ाई के मोर्चे पर हमें ही सन्नद्ध होना होगा। इसकी अहमियत सबके सामने है और जैसा कि ब्रिटेन के महान लेखक हैराल्ड पिन्टर ने अपने एक वक्तव्य में लिखा था यह दरअसल मनुष्य की गरिमा की बहाली की लड़ाई है।

(प्रेमचन्द जयन्ती पर प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित सभा में प्रस्तुत वक्तव्य, 31 जुलाई 2014, जयपुर प्रेस क्लब, जयपुर)

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Subhash Gatade is a New Socialist Initiative (NSI) activist. He is also the author of 'Godse's Children: Hindutva Terror in India' ; 'The Saffron Condition: The Politics of Repression and Exclusion in Ne

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