-एल. एस. हरदेनिया


    
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मध्यप्रदेश के प्रति विशेष ध्यान दे रहा है। अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश के धार जिले के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक बैठक हुई थी। उसके बाद फिर 31 जुलाई 2014 से भोपाल में चार दिन तक बैठक चली। इस बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के अलावा संगठन के अनेक पदाधिकारियों ने भाग लिया। बैठक के पहले समाचारपत्रों ने यह अंदाज लगाया था कि चार दिवसीय बैठक में केन्द्र की सरकार के लिए एजेण्डा तैयार किया जायेगा और फिर इस एजेण्डे के अंतर्गत संघ की विचारधारा के अनुसार केन्द्र का शासन चलवाया जायेगा। स्पष्ट है कि चर्चा का केन्द्र बिन्दु संघ की हिन्दुत्ववादी विचारधारा के आसपास मंडराएगा। वैसा हुआ भी। समाचारपत्रों में यह भी छपा कि संघ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों से खफा है। बातचीत के दौरान कुछ लोगों ने ऐसा विचार प्रकट किया भी।

संघ की बैठकें अत्यधिक गुप्त तरीके से संपन्न होती हैं। बैठक में क्या तय किया गया यह पता लगाना काफी कठिन होता है। परंतु यदि कोई बात किसी तरह से पता लग भी जाती है और वह बात संघ के नेतृत्व को पसंद नहीं आती है तो उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से नाराजगी प्रकट की जाती है। ऐसा इस बार भी हुआ। संघ की बैठकों के बाद साधारणतः पत्रकारवार्ताएं आयोजित नहीं होती हैं। चूंकि इस बार बैठक के पूर्व और बैठक के दौरान कुछ ऐसी बातें प्रकाशित हुईं जिनसे संघ और केंद्रीय सरकार के बीच के रिश्तों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता था, इसलिए स्थिति को स्पष्ट करने के लिए भोपाल में एक पत्रकारवार्ता का आयोजन किया गया। पत्रकारवार्ता को संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने संबोधित किया। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि भोपाल में आयोजित बैठक में तीन विषयों पर मुख्यतः विचार हुआ। पहला हिंदुत्व, दूसरा सामाजिक समरसता और तीसरा विकास। ज्यों ही वैद्य ने अपनी बात समाप्त की, तो पत्रकारों की ओर से प्रश्न पूछे जाने लगे। पत्रकारों ने उनसे प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश, मंहगाई और इसी तरह के कुछ और विषयों से संबंधित प्रश्न पूछे। उन्हें यह सब प्रश्न अच्छे नहीं लगे। जब पत्रकारों ने बार-बार जोर दिया तो वे वहां से उठकर ही चले गए और एक तरह से उन्होंने पत्रकारवार्ता का बहिष्कार कर दिया।

जैसा कि सर्वविदित है संघ का मुख्य उद्देश्य भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। हिन्दू राष्ट्र कैसे बनाया जाए इस बारे में संघ की अपनी सोच है। इस सोच के अनुसार हिंदुत्व के राजनीतिक दर्शन के माध्यम से अपनी मंजिल पर पहुंचा जा सकता है। संघ के संविधान के अनुसार संघ का सदस्य वयस्क हिन्दू पुरूष ही बन सकता है। संघ में न तो गैर हिन्दुओं का स्थान है और ना ही महिलाओं का।

संघ की भोपाल बैठक के दौरान, संघ के सरसंघचालक डा. मोहनराव भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि यदि हिन्दू समाज एकजुट होकर खड़ा हो जाए तो भविष्य में भारत किसी भी आक्रमण को सहन कर सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विदेशी ताकतें अपने स्वार्थ और एकाधिकार के चलते हिन्दू समाज को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने हिन्दू समाज से एकजुट होने का आव्हान किया। डा. भागवत यह बात भूल गए कि भारतवर्ष में अकेले हिन्दू नहीं रहते हैं। यहां यह बात स्पष्ट करना आवश्यक है कि संघ जिन्हें हिन्दू समझता है वे वास्तव में हमारे देश में अल्पसंख्यक की हैसियत रखते हैं। संघ की मनुस्मृति में आस्था है। जब संविधान बन रहा था तो संघ की ओर से यह कहा गया था कि हमें नये संविधान बनाने की क्या आवश्यकता है हमारे पास मनुस्मृति तो है। मनुस्मृति के अनुसार हिन्दू समाज चार भागों में विभक्त है। पहला ब्राह्मण, दूसरा क्षत्रिय, तीसरा वैश्य और चैथा शूद्र। मनुस्मृति की विवेचना के अनुसार शूद्रों को वे अधिकार प्राप्त नहीं है जो ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को प्राप्त हैं। शूद्र मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, हर स्थान पर उनकी बस्ती अलग होती है, वे पानी के उसी श्रोत से पानी नहीं ले सकते हैं जिससे उच्च तीन वर्गों के लोग लेते हैं।

स्पष्ट है कि संघ की विचारधारा के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही हिन्दू हैं। हिन्दुओं की एकता का अर्थ इन तीनों वर्णों की सदस्यों की एकता ही समझा जायेगा। क्या अकेले इनकी एकता से देश की रक्षा की जा सकती है, इनके अतिरिक्त हमारे देश में शूद्र अर्थात दलित, आदिवासी, बुद्ध, जैन,सिक्ख, मुसलमान और ईसाई भी निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त देश का एक महत्वपूर्ण भाग अनिश्वरवादी है जो ना तो ईश्वर की सत्ता में विश्वास करता है और ना ही किसी धर्म का पालन करता है। ये सब भारतीय हैं, भारत के नागरिक हैं। यदि भारत की रक्षा करना है और विकास करना है तो वह इन सभी की एकता से संभव होगा। यह बात समझ के परे है कि संघ भारतीयों से एक होने की अपील क्यों नहीं करता, हमारा ऐतिहासिक अनुभव है कि देश के इन सभी निवासियों की एकता से हम सफलतापूर्वक आजादी का आंदोलन लड़ सके थे। 1857 की क्रांति इसी एकता का जीता-जागता उदाहरण है। उसके बाद हमारे ऊपर तीन युद्ध लादे गए। पहला युद्ध 1962 में चीन ने लादा, बाद में 1965 और 1971 में पाकिस्तान ने। इन तीनों युद्धों के दौरान भारत में रहने वाले सभी धर्मों और आदर्शों में विश्वास कर असाधारण एकता दिखाई थी और उनकी की एकता का परिणाम था कि हम अपनी रक्षा कर सके थे। दुःख की बाद है कि संघ इस बुनियादी तथ्य की उपेक्षा करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने परिश्रम, प्रतिबद्धता और समर्पण से इस देश में बहुत कुछ हासिल किया है। देश संघ के संगठन और उसकी प्रतिबद्धता से  इससे ज्यादा भी  लाभांवित हो सकता था यदि संघ अकेले तथाकथित हिंदुओं की बात न करके समग्र भारतीयों की बात करता।

यहां यह भी स्मरण दिलाना आवश्यक है कि 1949 में जब संघ के ऊपर लगा प्रतिबंध हटाया गया था उस समय संघ ने आश्वासन दिया था कि संगठन के रूप वह राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेगा और एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करेगा। कुछ वर्षों तक तो संघ यह आश्वासन पूरा करता रहा परंतु बाद में उसने सीधे राजनीति में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया और अब ऐसी स्थिति आ गई है कि संघ का राजनैतिक आनुषांगिक संगठन, भारतीय जनता पार्टी, पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा नियंत्रण है। कोई भी प्रमुख फैसला यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारियों का चयन बिना संघ की मर्जी के नहीं होता।


भोपाल में संपन्न बैठक के दौरान संघ ने अपनी कमजोरियों पर भी चर्चा की और यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि स्वयंसेवकों का बौद्धिक स्तर दिन-प्रतिदिन गिर रहा है। संघ की बैठक के दौरान यह आव्हान किया गया कि संघ के प्रतिनिधि कम से कम चार किताबें अवश्य पढ़ें। ये चार किताबें बालासाहब देवरस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंथ ठेंगड़ी और डा. अंबेडकर द्वारा लिखीं गईं। इस बैठक में संघ से जुड़े ऐसे नेता भी शामिल हुए जो प्रायः अत्यधिक गैर-जिम्मेदाराना और भड़काने वाली बात करते हैं। इनमें प्रमुख थे डा. प्रवीण तोगडि़या। तोगडि़या ने जिनके नरेन्द्र मोदी से अच्छे संबंध नहीं हैं, यह मांग की कि केन्द्र की सरकार को राममंदिर, समान नागरिक संहिता और धारा 370 के बारे में जो आश्वासन दिया है उसे याद रखना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अमरनाथ यात्रियों और उनके सहयोगियों पर हमला करने वालों को हिन्दुओं की धैर्य की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर की सरकार आतंकवादियों को आश्रय दे रही है।