Wednesday, October 23, 2013

कविता- उन्होंने कहा


  - सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय   

उन्होंने कहा- दिन
हम कलेवा करके काम पर निकल गए
उन्होंने कहा-रात
हम  ब्यारी  करके सोने  चले गए
उन्होंने कहा- गुलामी
हम बिकने के लिए मंडी में जाकर खड़े हो गए
उन्होंने कहा- आज़ादी
हम गुलामो की तरह उनके पीछे लग गए
और अपना सर्वस्व होम कर दिया  आज़ादी के लिए
उन्होंने कहा-निर्माण
 हमने अपनी हड्डियाँ गला दी ताकि वे इस्पात  बना सकें
उन्होंने कहा-विध्वंश
और हम अपने ही बिरादरों पर
बम बन्दूक लेकर चढ़ दौड़े
आखिर हमें परंपरा ने सिखाया था
बड़ों का आदर करना
उनकी कही बात पर शंका नहीं सिर्फ अमल करना
और हम मन जाते।

वे बैठने को कहते तो हम साष्टांग लेट जाते
परन्तु,
जब हमने कहा-भूख
उन्होंने कहा - कामचोरी
हमने कहा-गरीबी
उन्होंने कहा - नशाखोरी
हमने तंग आकर कहना चाहां- शोषण
उन्होंने कहां- बगावत?
हमने कहा-अधिकार
उनका नारा-विकास
हमने मांगी रोटी और कहा संघर्ष
उन्होंने निकाली - बन्दूक
और हम, हम न रहे
अखबार की बन गए।.
-
                                                                                                              

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