Sunday, March 25, 2012

सांस्कृतिक बहुलवाद पर "वियना "में विमर्श



डॉक्टर - असगर अली इंजीनियर


मुझे हाल में एक बार फिर सांस्कृतिक व धार्मिक बहुवाद पर आयोजित एक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आस्ट्रिया आमंत्रित किया गया। संगोष्ठी, वियना के निकट डन्सस्टीन नामक मध्यकालीन गाँव में आयोजित थी। डेन्यूब नदी के किनारे स्थित इस गाँव में अनेक चर्च और अत्यन्त आकर्षक मध्यकालीन भवन हैं । गाँव की सुन्दरता सचमुच मंत्रमुग्ध कर देने वाली थी। होटल के जिस कमरे में मुझे रूकवाया गया था उसकी खिड़की से देखने पर ऐसा लगता था मानो आप कोई पिक्चर पोस्टकार्ड देख रहे हों । मैं 23 फरवरी को संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र शुरू होने से कुछ ही घंटो पहले वहां पहुँचा था।   

मुझसे “भारतीय अनुभव के संदर्भ में विभिन्नता और बहुवाद“ विषय पर उद्घाटन भाषण देने का अनुरोध किया गया। संगोष्ठी का आयोजन संबंधित राज्य सरकार ने किया था और वियना की एक जानीमानी पत्रकार सुश्री उरसुला बाट्ज को आयोजन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सुश्री बाट्ज कुछ वर्षों पहले मुंबई में हमारे कार्यालय आईं थीं और उन्होंने हमारे कार्यक्रमों को काफी सराहा था। शायद इसलिए उन्होंने मुझे इस संगोष्ठी का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया।  

उद्घाटन सत्र में डिप्टी गर्वनर, एबी (अर्थात चर्च के प्रमुख पादरी),  विश्वविध्यालय  के चांसलर और अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। अपने उद्घाटन भाषण में मैंने भारत की विभिन्नता व धार्मिक और सांस्कृतिक बहुलता के सकारात्मक व नकारात्मक, दोनों पहलुओं पर विस्तृत प्रकाश  डाला। मैंने कहा कि भारत हमेशा से विस्मित कर देने वाली विभिन्नताओं का देश  रहा है। यहां धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषायी विभिन्नताएं तो हैं हीं, सामाजिक परंपराओं और प्रथाओं में भी भारी विभिन्नता है। यह कहना  अतिश्योक्ति न होगी की भारत में हर दस-बीस किलोमीटर पर सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं बदल जाती हैं और एक नई बोली सुनाई देने लगती है।   

हम भारतीयों को इस विभिन्नता के कारण कभी कोई परेशानी नहीं हुई। सच तो यह है कि कुछ सदियों पहले तक यह विभिन्नता हमारी ताकत थी न कि कमजोरी। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने हम भारतीयों के बीच विभाजन के बीज बोये और सन् 1947 में देश छोड़कर जाने के पहले उन्होंने भारत के दो टुकड़े कर दिए। दूसरी ओर, यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही धार्मिक, सांस्कृतिक व भाषाई विभिन्नताओं का उद्भव हुआ। युद्ध में नष्ट हो चुकी अपनी अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करने के लिए कामगारों की आवश्यकता थी और ये कामगार विश्व के दूसरे हिस्सों से यूरोप आये। 

यहां मैं यह बताना चाहूगा कि आस्ट्रिया में इस संगोष्ठी का आयोजन, यूरोप में दक्षिणपंथियों के बढ़ते प्रभाव व इस कारण गहराते अंतर्धार्मिक तनाव की पृष्ठभूमि में किया गया था। विभिन्न धर्मों के मानने वालों के बीच बढ़ते तनाव से शान्ति  के पैरोकार चिंतित हैं और वे इस तनाव के कारण और इसे कम करने के उपाय जानना-समझना चाहते हैं। आस्ट्रिया में दक्षिणपंथी दलों की वोटों में हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक पहुच  गई है जो अत्यन्त चिंतनीय है।  

सन् 1999 में भारत में हुए आम चुनाव में भाजपा ने 29 प्रतिशत वोट पाए थे और इसके बाद ही वह एन.डी.ए गठबंधन के रूप में केन्द्रीय सत्ता पर काबिज हो गई थी। भाजपा, रामजन्मभूमि आंदोलन के रथ पर सवार होकर और देश  में धार्मिक उन्माद भड़काकर सत्ता में आई थी। चाहे वह भारत हो, आस्ट्रिया या कोई भी अन्य देश , दक्षिणपंथी  ताकते  धार्मिक उन्माद उत्पन्न कर समाज का धर्म या संस्कृति के आधार पर ध्रुवीकरण  करती हैं। अक्सर मीडिया इन ताकतों के घृणा फैलाने के अभियान में सहायक बनता है। 
मैंने अपने उद्घाटन भाषण में भारत और पश्चिम  दोनों में मीडिया की भूमिका पर चर्चा की। पश्चिमी  मीडिया का हमेशा  से यह दावा रहा है कि वह निष्पक्ष व पूर्वाग्रहमुक्त है। यह दावा, दरअसल, खोखला है। पश्चिमी मीडिया, धार्मिक और नस्लीय, दोनों ही दृष्टियों से अत्यन्त पूर्वाग्रहग्रस्त है। साम्राज्यवादी काल से ही पश्चिमी मीडिया मुस्लिम-विरोधी रहा है क्योंकि साम्राज्यवादी ताकतों को अपने-अपने उपनिवेशो  में विशेषकर  मुसलमानों और सामान्यतः धार्मिक नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा था।  
साम्राज्यवादी ताकतों की यह मान्यता थी कि एशियाई  व अफ्रीकी देशो  के निवासी-विशेषकर मुसलमान -पिछडे़ हुए व जंगली हैं और उन्हें “सभ्य“ बनाने की जिम्मेदारी साम्राज्यवादी ताकतों की है। यह दिलचस्प है कि तथाकथित “जंगली“ भारतीय, अंग्रेजों से कहीं ज्यादा सभ्य थे क्योंकि जहां उनके नेता महात्मा गाँधी ने अहिंसात्मक तरीकों से विदेशी शासन का विरोध किया वहीं ‘सभ्य’ अंग्रेजों ने हिंसा व बल प्रयोग के माध्यम से भारत पर अपना सिक्का जमाया।    

मैंने अपने भाषण में यह भी कहा कि 9/11 के बाद से पश्चिमी मीडिया का इस्लाम व मुसलमानों के प्रति बैरभाव और बढ़ गया। उसे इस्लाम में केवल बुराईयां ही बुराईयां नजर आने लगीं। जो पत्रकार पश्चिमी अखबारों में लिखते हैं उन्होंने कभी इस्लाम का अध्ययन करने का कष्ट नहीं उठाया। उन्होंने यह जानने की कभी चेष्टा नहीं की कि क्या जिहाद, पर्दाप्रथा व महिला अधिकारों जैसे विषयों पर मुसलमानों में कोई मत विभिन्नता है या नहीं। वे जानबूझकर, अतिवादी मुसलमानों के विचारों को प्राथमिकता देते हैं और उन्हें प्रमुखता से प्रकाशित कर दुनिया के सभी मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करते हैं। 

चाहे पश्चिमी देश हों या भारत, अधिकांश  पत्रकार धार्मिक व सांस्कृतिक बहुसंख्यकवाद के अन्धसमर्थक हैं। बहुसंख्यकवाद के प्रभाव में बढ़ोत्तरी से अल्पसंख्यकों के अधिकारों में कटौती होती है और प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था की निष्पक्षता व गुणवत्ता प्रभावित होती है। जिस देश  का आम आदमी अल्पसंख्यक समूहों के प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहता है वहां के अल्पसंख्यक कभी  उन्नति नहीं कर पाते। ऐसे समाज में कानून और व्यवस्था बनाये रखना भी एक कड़ी चुनौती होती है।   
उदाहरणार्थ, भारत में दक्षिणपंथी ताकतों के अनवरत दुष्प्रचार और प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के पूर्वाग्रहपूर्ण रवैये के चलते बहुसंख्यक समुदाय के एक बड़े तबके के दिलो-दिमाग में जहर भर गया है और इसी कारण किसी भी मामूली मुद्दे को लेकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा भड़काना बहुत आसान हो गया है। भारत में गरीबी और बेरोजगारी के चलते लोग आसानी से लूटपाट में हिस्सा लेने लगते हैं। 
पश्चिमी देशो  में भारत की तुलना में बेरोजगारी व गरीबी बहुत कम है। अतः वहाँ लूटपाट करने के लिए लोग आसानी से प्रेरित नहीं होते। परन्तु वहां भी पूर्वाग्रहों के चलते, शासन व्यवस्था की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है। यह दिलचस्प है कि जिस तरह भारत में भाजपा, भारतीय संस्कृति को हिन्दू संस्कृति बताती है उसी तरह पश्चिम  में दक्षिणपंथी संगठन यह कहते नहीं थकते की यूरोप की संस्कृति, ईसाई संस्कृति है। उन्हें भी धर्मनिरपेक्षता से उतना ही परहेज है जितना कि भाजपा को और वे भी अल्पसख्यकों की संस्कृति को नीची निगाहों से देखते हैं।

संगोष्ठी में चर्चा में भाग लेते हुए प्रसिद्ध आस्ट्रियन अभिनेत्री कैथरीना स्टेमबर्गर ने कहा कि आस्ट्रिया की अदालतों में जज की कुर्सी की पीछे क्रास लटका रहता है। क्या इससे अल्पसंख्यक समुदाय के आरोपियों के मन में यह शंका का उठना स्वभाविक नहीं है उन्हें न्याय नहीं मिलेगा? जब अस्ट्रिया एक धर्मनिरपेक्ष देश  है तब वहां की धर्मनिरपेक्ष अदालत में ईसाई धार्मिक चिन्हों के लिए कोई जगह क्यों होनी चाहिए? इसके बाद एबी ने कहा कि वे इसमें कुछ भी गलत नहीं देखते? क्या स्कूलों और अस्पतालों की दीवारों पर क्रास नहीं टंगा रहता?  

इस सिलसिले में मैंने कहा कि भारत में भी हम ऐसी ही समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पुलिस थानों में हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें टंगी रहती हे और बहुसंख्यक समुदाय के (सिवाय धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध लोग के) सदस्य इसमें कुछ भी गलत नहीं देखते। बल्कि वे इसे सही ठहराते हैं। मैंने एबी से कहा कि स्कूलों और अस्पतालों की दीवारों पर क्रास इसलिए टंगा रहता है क्योंकि इन संस्थाओं का संचालन मिश्निरिया करती हे और उन्हें अपने संस्थानों की दीवारों पर अपने धर्म के चिन्ह को प्रदर्शित  करने का पूरा हक है। इसके विपरीत, अदालत एक सार्वजनिक स्थान है जिसमें किसी धार्मिक चिन्ह का प्रदर्शन  कदापि उचित नहीं कहा जा सकता।   
ऐबी अत्यन्त विनम्र व्यक्ति थे। उन्होंने मेरे उद्घाटन भाषण और बहस के दौरान मेरे हस्तक्षेपों की काफी सराहना की। दुर्भाग्यवश  वे अंग्रेजी नहीं जानते थे। उन्हें केवल जर्मन भाषा का ज्ञान था। यद्यपि संगोष्ठी में जर्मन से अंग्रेजी व अंगे्रजी से जर्मन अनुवाद की व्यवस्था थी तथापि हम लोगों के लिए एक दूसरे को समझना दुष्कर था।
हालिया विश्व्यापी  आर्थिक मंदी ने हालातों को और विकट बना दिया है (हालांकि आस्ट्रिया पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ा)। यूरोपीय देशो  में बढ़ती बेरोजगारी ने प्रवासियों को अलोकप्रिय मेहमान बना दिया है। आस्ट्रिया में तुर्की के मुसलमानों की बड़ी आबादी है। ये लोग वहां तब आए थे जब आस्ट्रिया में (सन् 1960 के दशक   में) कामगारों की जरूरत थी। 
आज आस्ट्रिया में तुर्की मूल के मुसलमानों को नीची निगाहों से देखा जाता है। भारत की तरह, राजनीति ने भी समस्या को बढ़ाने में योगदान दिया है। सोलहवीं सदी में तुर्की सेना, आस्ट्रिया तक पहुच गई थी। यद्यपि तुर्की सुल्तान इस इलाके में अपना शासन कायम नहीं कर सके तथापि उन्हें आक्रान्ताओं की तरह देखा जाता है। मीडिया ने इस्लाम की छवि एक हिंसक व घोर असहिष्णु धर्म की बना दी है- एक ऐसे धर्म की जिसे मानने वाले अन्य सभी धर्मावलम्बियों से घृणा करते हैं। 

संगोष्ठी में अनेक प्राध्यापकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों ने अपने शोधपत्र पढ़े। प्रतिभागियों में महिलाओं की संख्या काफी थी और उन्होंने विमर्श   में सक्रिय भागीदारी की। कैथरीना संगोष्ठी के आखिरी दिन (26 फरवरी) विमर्श में शामिल हुईं। संगोष्ठी 23 से 26 फरवरी अर्थात चार दिन चली। कैथरीना मुझे धर्मनिरपेक्ष व महिलावादी लगीं। महिला अधिकारों पर चर्चा के दौरान उन्होंने एक प्राचीन ईसाई धर्मग्रन्थ को उद्धत करते हुए कहा कि पुराने समय में चर्च में विवाह के दौरान पादरी दुल्हन को सलाह देते थे कि वह अपने पति के प्रति उसी तरह वफादार रहे जैसे कि एक कुत्ता अपने मालिक के प्रति रहता है। 



उन्होंने एबी की तरफ देखते हुए पूछा कि यदि महिलाओं की तुलना कुत्ते से की जाएगी तो वे कैसा महसूस करेगीं। इतनी सारी महिलाओं के सामने इस प्रश्न ने  निश्चत  रूप से एबी को दुविधा में डाल दिया होगा। उन्होंने मुस्करा कर कहा कि कैथरीना जिस ग्रंथ को उद्धत कर रहीं हैं वह मध्यकालीन है और अब चर्च में उसका इस्तेमाल नहीं होता। संगोष्ठी के प्रतिभागी व वहाँ प्रस्तुत शोधपत्र पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। सभी प्रतिभागी दक्षिणपंथी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित थे व इस तथ्य से भी कि आर्थिक संकट के कारण उनका मत प्रतिशत  बढ़ रहा है। विमर्श  काफी विचारोत्तेजक व प्रेरणास्पद था। सभी का यह मत था कि ऐसे विचार विमर्श आगे भी होते रहने चाहिए। उरसुला बाट्ज ने घोषणा की कि इसी विषय पर अगले वर्ष फिर से संगोष्ठी आयोजित होगी। इसके बाद हमने एक दूसरे से विदा ली।

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