Monday, January 30, 2012

मध्यप्रदेश प्रशासन ने भी अधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया कि राजधानी भी अछूती नही कुपोषण से


जावेद अनीस   

मध्यप्रदेश  शासन के महिला और बाल विकास विभाग ने भी अब ये मान लिया है कि राजधानी के बस्तीयों में करीब आधा फीसदी बच्चे कुपोषण के गिरफ्त में हैं। 
यह बात मध्यप्रदेश  शासन के महिला और बाल विकास विभाग द्वारा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली को जनवरी 2012 में भेजे गये पत्र (क्रं  केस नं 644/12/08/11) से सामने आयी है। 

ज्ञात हो कि नागरिक अधिकार मंच द्वारा फरवरी 2011 में मध्यप्रदेश  की राजधानी भोपाल में 5 साल से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति पर एक अध्ययन किया गया था। 
यह अध्ययन भोपाल शहर के 11 बस्तीयों में किया गया था। चयनित बस्तीयों में 5 साल तक के बच्चों के पोषण की स्थिति का पता करने के लिए कुल 255 बच्चों का वजन लिया गया था। इन बच्चों में 129 बच्चे सामान्य  और 126 बच्चे कुपोषित थे। इन 126 बच्चों में 51 बच्चे अतिकुपोषण के शिकार  थे। यानी तौल किये गये बच्चों में से लगभग आधे बच्चे कुपोषित /अतिकुपोषित पाये गये थे। 

इस अध्ययन के रिर्पोट को सबंधित सरकारी विभागों और विभिन्न आयोगों को ज्ञापन के साथ सौपा गया था।

अध्ययन के आधार पर निम्नलिखित मांगें रखी गई थी -          
  •  भोपाल के सभी स्लम क्षेत्रों में बच्चों के कुपोषण की स्थिति की जाच की जाये तथा कुपोषित बच्चों के लिए स्थानीय स्तर पर तत्काल पोषण पुर्नवास के लिए व्यवस्था की जाये। 
  • आंगनबाड़ी केन्द्रों के उदेश्यों  की पूर्ति के लिए एक अतिरिक्त कार्यकर्ता की नियुक्ति हो जिसकी मुख्य जिम्मेदारी बच्चों के पोषण और स्वास्थ की निगरानी करना हो। 
  • आंगनबाड़ी कार्यकताओं एवं सहायिकाओं के द्वारा उनके मानदेय में बढोत्तरी की जायज मांग को माना जाये तथा मानदेय समय पर दिया जाये।
  • आंगनबाड़ी केन्द्रों में दिये जाने वाले पोषण आहार की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए दी जाने वाली वर्तमान राशि में बढोत्तरी की जाये। 
  • शहरों में बच्चे ढाई/तीन साल के होते होते ही स्कूलों में जाने लगते है। जिसके कारण वे आंगनबाड़ी में नही आते हैं। आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों की उपस्थिति सुनिश्चत  करने के लिए गुणवत्तापूर्ण प्री स्कूल शिक्षा  दी जाये। 
  • सभी स्लम क्षेत्रों में जीवन जीने के लिए अनिवार्य बुनियादी जरुरतें पानी, बिजली,शोचालय , स्वास्थ सुविधा, स्कूल, सम्मानजनक आवास, साफ सफाई उपलब्ध करायी जायें। 
  • शहर के दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं आर्थिक रुप से कमजोर तबकों के परिवारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाये। 
  • ग्रामीण क्षेत्रों की तरह शहरी क्षेत्रों के लिए भी रोजगार गारंटी योजना शुरुवात की जाये। 

इसी मांगों के सबंध में संगठन को संयुक्त संचालक (महिला बाल विकास, भोपाल) की ओर से अप्रैल 2011 में इसी विभाग  के भोपाल जिले के कार्यक्रम अधिकारी को भेजे पत्र की प्रतिलिपि भेजी गई थी, जिसमें कार्यक्रम अधिकारी को निर्देषित किया गया था कि नागरिक अधिकार मंच के अध्ययन रिर्पोट के अनुसार चिन्हित सभी कुपोषित बच्चों के उपचार एवं देखभाल हेतु समुचित व्यवस्था की जाये और इस सबंध में की गई कार्यवाही के बारे में संभागीय संयुक्त संचालक को दो सप्ताह के भीतर अवगत कराया जाये। 

इसके बाद से विभाग द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में मंच को कोई सूचना नही दी गई। 

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली द्वारा नागरिक अधिकार मंच के अध्ययन रिर्पोट को लेकर मध्यप्रदेष के महिला और बाल विकास विभाग से प्रतिवेदन मांगा गया था। 

जनवरी 2012 में महिला और बाल विकास विभाग ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली को इस सबंध में किये गये कार्यवाहियों को लेकर एक स्थिति रिर्पोट भेजी है। जिसकी एक प्रति नागरिक अधिकार मंच को भी भेजी गई है। 

मध्यप्रदेश  महिला और बाल विकास विभाग द्वारा भेजे गये प्रतिवेदन में  निम्नलिखित बातें है जिन्हें हम बिना परिर्वतन के दे रहे हैं

  1.  विभाग द्वारा सबंधित 11 बस्तियों में पुनः 266 बच्चों का वजन कराया गया जिसके अनुसार सामान्य वजन के 140 बच्चे, कम वजन के 88 बच्चे, अतिकम वजन के 38 बच्चे पाये गये। इनमें से 12 बच्चे पोषण पुर्नवास केन्द्रों में भर्ती कराने योग्य थे।
  2. पोषण पुर्नवास केन्द्रों में भर्ती कराने योग्य बच्चों में से 4 बच्चों को पोषण पुर्नवास केन्द में भर्ती कराया गया। बाकि 8 बच्चों के माता पिता ने पारिवारिक कारणों से पोषण पुर्नवास केन्द्र में बच्चों को भर्ती नही कराया, इन बच्चों को स्थानिय स्तर पर पोषण आहार वितरण एवं स्वास्थ्य  शिविरों  के माध्यम से लाभान्वित किया गया।
  3. अटल बिहारी वाजपेयी बाल आरोग्य एवं पोषण मिशन अंतर्गत तैयार की गई कार्ययोजना में सभी हितग्राहियों के सघन सर्वेक्षण एवं पंजीकरण हेतु अभियान चलाया गया है। सर्वेक्षण में वंचित रहे आई.सी.डी.एस. के हितग्राहियों की पहचान हेतु आउट सोर्स एजेन्सी से क्रास मूल्यांकन का प्रावधान रखा गया है।
  4. कुपोषित बच्चों को ट्रेकिंग हेतु ट्रेकिंग कार्ड एवं मानिटरिंग साफ्टवेयर तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से प्रत्येक बच्चे की प्रतिदिन प्राप्त सेवाओं की निगरानी रखी जा सकेगी।
  5. कम वजन के बच्चों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी बाल आरोग्य एवं पोषण मिशन अंतर्गत वर्ष 2011-12 की इस अवधि में स्वास्थ्य  शिविरों   का आयोजन किया गया,जिसमें 1598 लाभान्वित हितग्राही रहे।
  6. गंदी बस्ती क्षेत्रों को चिन्हित कर स्वास्थ्य विभाग एवं नगर निगम के सहयोग से  विशेष स्वास्थ्य जांच  शिविरों   का आयोजन किया गया, जिसमें स्वच्छता, स्वास्थ्य एवं पोषण विषय पर फिल्म प्रदर्शन  तथा नुक्कड नाटक का आयोजन किया गया।
  7. भोपाल शहर में 2.5 वर्ष से 3 वर्ष के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं जिससे ये बच्चे आंगनबाडियों में उपस्थित नही होते है जो गंभीर समस्या है, इसके निराकरण हेतु अटल बाल आरोग्य एवं पोषण मिषन अंतर्गत प्रस्तावित कार्य योजना में प्रत्येक आंगनबाडी केन्द्रों के लिये प्री स्कूल शिक्षा  में दक्ष मांटेसरी शिक्षक  रखने का प्रावधान किया गया है।

नागरिक अधिकार मंच द्वारा पत्र में दिये गये सुझावों के सबंध में जानकारी निम्नानुसार है

  1. आंगनबाडी कार्यकर्ता एवं सहायिकाओं के मानदेय में भारत सरकार द्वारा की गई वृद्वि अनुसार राज्य शासन द्वारा आदेश  जारी किये गये हैं। 
  2. आंगनबाड़ी केन्द्रों पर दिये जाने वाले पोषण आहार की दर में वृद्वि भारत सरकार द्वारा की जाती है, इस हेतु समय समय पर आयोजित बैठकों में इस विषय पर राज्य का पक्ष रखा गया है। 


हम प्रशासन द्वारा उठाये गये इन कदमों का स्वागत करते हैं परन्तु हम इससे पूरी तरह से सतुंष्ट नही हे।

प्रशासन द्वारा चयनित 11 बस्तीयों को छोड़ कर बाकि बस्तीयों में कोई प्रक्रिया नही चलायी गई। 

इस अध्ययन के पीछे सोच यह थी कि मध्यप्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण की स्थिति तो जगजाहिर है अमूमन इसी की चर्चा भी ज्यादा होती है ऐसे में क्यों ना प्रदेश के शहरों की भी स्थिति जानी जाये।
यह अध्ययन भोपाल की 11 बस्तीयों में एक सैम्पल के तौर पर किया गया था, बस्तीयों का चुनाव करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि शहर के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व हो सके। 

हम यह मानते हैं कि कुछ एक अपवादों को छोड़ कर भोपाल की सभी बस्तीयों ( जवाहरलाल नेहरु शहरी नवीनिकरण मिष्न के तहत बनायी गई भोपाल की शहर विकास योजना में 380 बस्तियों को ही शामिल किया गया है जबकि सामाजिक संस्था आक्सफेम द्वारा 2006 में किये गये एक सर्वे में 542 बस्तिया पायी गयी थी) में कमोवेश  यही स्थिति है। 

हमारे शहरों की लगभग आधी आबादी आवास सुरक्षा के अभाव में झुग्गी बस्तीयों में रह रही है। इन लोगों के पास जनसुविधाओं का नितांत अभाव है। अर्जुन सेन गुप्ता की रिर्पोट कहती है कि भारत की 77प्रतिशत आबादी 20रु से कम पर गुजारा करती है। प्लांनिग कमीशन के अनुसार शहरी मध्यप्रदेश  में 42 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे रहती है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में ये आंकड़ा 37 प्रतिशत है।

आर्थिक और सामाजिक रुप से कमजोर तबके ही इन झुग्गी बस्तियों में रहते है जहा जीवन जीने के बुनियादी जरुरतें पानी, बिजली, शोचालय, स्वास्थ सुविधा, स्कूल, सम्मानजनक आवास, साफ सफाई आदि नही होती है। ऐसे विपरीत परिस्थितियों का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव बच्चों और महिलाओं पर पड़ता है और  अभाव / भूखमरी की मार बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ती है। आवश्यक  भोजन नही मिलने की वजह से बड़ों का शरीर तो फिर भी कम प्रभावित होता है लेकिन बच्चों पर इसका असर तुरंत पड़ता है जिसका असर लम्बे समय तक रहता है। सबसे पहले तो गर्भवती महिलाओं को जरुरी पोषण नही मिल पाने के कारण उनके बच्चे तय मानक से कम वजन के होते ही है, वही जन्म के बाद अभाव और गरीबी उन्हें भरपेट भोजन भी नसीब नही होने देती है। नतीजा कुपोषण होता है। जिसकी मार या तो दुखद रुप से जान ही ले लेती है या इसका असर ताजिंदगी दिखता है। वर्तमान ही भविष्य बनाता है और हमारे इस वर्तमान का खामयाजा अगली पीढ़ी को भुगतना ही पड़ेगा। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के 3 साल से कम उम्र के 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के  शिकार है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषण से ग्रस्त है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि ऐसे बच्चों को बीमारीयों से जान गवाने का खतरा सामान्य बच्चों से 8 गुना ज्यादा होता है। 

ऐसे में इस समस्या का हल केवल आंगनबाड़ी के भरोसे नही छोड़ा जा सकता है। तमाम कई सारे अध्ययन रिर्पोट इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारे बच्चों का स्वास्थ्य उनके परिवारों के जीवन तथा आमदनी के स्तर से सीधे तौर से जुड़ा हुआ है। 

भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर करता था। जरुरत इस खर्च को बढ़ाने की है जो कि सरकार के लिए कोई बड़ी राशि नही होगी साथ ही साथ इस बड़ी आबादी के लिए व्यापक पैमाने पर रोजगार पैदा करने की जरुरत है।

नागरिक अधिकार मंच द्वारा जारी पूरे रिपोर्ट के लिए इस लिंक पर जायें:-
http://nagrikadhikarmanch.blogspot.com/2011/04/blog-post_03.html

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