Wednesday, April 22, 2015

कविता :- रंगीन बचपन


वाल्टर पीटर 


केसरी हरी टीशर्ट  में अब बट जायेंगे बच्चें..
क्योकि है ये सब यही कही के, इसके -उसके बच्चें..
पर डंडा सबका एक ही होगा सबक भी उनका नेक ही होगा !
अब Teacher को भी , पहननी चाहिए ..इन दो रंगों की साड़ी...
क्यों आती हैं हर बार बच्चो की ही बारी !
सुना है रंग में धर्म छूपा है..छुपा है एक बटवारा...
ऐसा केसा डोनर है वो जो बाटे जहां हमारा !
बच्चो को रंग देने है तो सारे रंग दे दो...
उनको भी आजादी से अपने रंग चुनने दो !
चाहते क्या हो ...
अहमद का दोस्त न रामू होगा ?
तो John – हरभजन का इस कक्षा मैं फिर क्या होगा ?
बटने पर जब दुनिया आती है तो सब कुछ है बट जाता..
सुना है कुछ लोगो को , गाल का रंग भी है दिख जाता !
पर वो तो बच्चे है , उनको क्या लेना देना ...
टॉफी का चटकारा है बस, ब्रांड से क्या लेना देना !
जीतना चाहे बाटो पर हवाओ को है चलना...
करना चाहते हो तो बस - इतना ही कर देना .
मार और पिटाई की जगहे

मस्ती से उनको पड़ने - लिखने देना !



----------------------------------------
 वाल्टर पीटर  वरिष्ट रंगकर्मी हैं और बच्चों के साथ काम करते हैं 



No comments:

Post a Comment