Tuesday, November 5, 2013

कविता - मुर्दाघर

निदा फ़ाज़ली
Courtesy -www.theprovince.com


सारी लाशें  एक सी थीं
वो ही आखें
मेरे जैसी
वो ही टांगें
तेरे जैसी
सारे बच्चे बच्चों जैसे
सारे बूढ़े बूढ़ों जैसे

सारी लाशें चुप थीं लेकिन
मुर्दाघर के चारों जानिब
शोरगुल था

मौत के सौदागरों का
जि़न्दगी के दुष्मनों का
मज़हबों का, सरहदों का

चोटियों में
दाढि़यों में
बिन्दियों में
नाक से नीचे की नंगी झाडि़यों में
जिन्दगी को जिस तरह
टुकड़ों में बांटा  जा रहा था
मौत को भी
जात और धर्मों से छांटा जा रहा था

कौन किसका
किसके कितने

ग़म तो ग़म है
केसरी क्या और हरा क्या

मेरे मातम में, वहां जितने भी थे
इन्सान थे वो
टूटा-फूटा हिन्दूस्तान थे वो

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