Saturday, April 30, 2011

कॉल सेन्टरों के श्रमिक


-उपासना बेहार

नुराग (काल्पनीक नाम) ने कॉल सेन्टर ज्वांइन करते ही सोचा था कि अब तो केवल और केवल  ऐशो -आराम के दिन आ गये और उसके सोचने में कोई गलत बात भी नही थी क्योंकि उसे नौकरी में मोटी तनखा और अन्य भौतिक सुविधाऐं मिलने जो वाली थी।

लेकिन ये सपना कुछ ही दिनों में हवा हो गया। वह हमेषा काम के अत्यधिक तनाव में रहने लगा। शांत रहने वाला अनुराग चिड़चिड़ा हो गया । ऐसा नही है कि यह केवल एक अनुराग की ही बात है। ज्यादातर कॉल सेन्टरों में काम करने वाले युवाओं की ऐसी ही हालत है और उनके इस हालत का जिम्मेदार इन सेन्टरों की कार्यप्रणाली है। 

आज देश  के बड़े शहरों में कॉल सेन्टर युवाओं के लिए बड़े रोजगार के केन्द्र के रुप में उभरे है। वर्तमान में लगभग 4 लाख युवा (औसतन् 25 साल की उम्र तक ) कॉल सेन्टरों में काम कर रहें है। कम्प्यूटर जानने वाले और अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं के लिए यह सेक्टर रोजगार के बड़े क्षेत्र के रुप में उभरे है।
  
चूॅकि इस सेक्टर का अधिकतर काम विदेश उपभेक्ताओं की जरुरत को पूरा करना होता है अतः ज्यादातर कर्मचारी सारी रात काम करते है और दिन भर सोते हैं। जिससे जैविक क्रियाओं में गड़बड़ी होने लगती है। स्वास्थ सबंधी अनेक बीमारी होती है। धीरे-धीरे गुस्सा, चिड़चिड़ापन, उदासी, हताशा  घर कर जाती है। निजी जिन्दगी अजीब सी स्थिति में आ जाता है। सामाजिक सबंध खत्म होने लगते हैं जो भी दोस्त बनते है वो ज्यादातर उन्ही के कॉल सेन्टर में ही काम करने वाले होते है। जो कर्मचारी शादीषुदा होते है वो काम के अट-पटे समय के कारण अपने परिवार को समय नही दे पाते हैं इससे परिवार में बिखराव की स्थिति बनती है।  इस तरह उनके चारो ओर उन्ही के जैसे परेषान लोगों का जमघट बनता जाता है। इन कॉल सेन्टर में कोई कर्मचारी अधिकार भी नही होता है।

शुरु-शुरु  में हर कर्मचारी को यह काम अच्छा लगता है। एक नयी दुनिया होती है पर उन्हें यहां अपनी वास्तविक पहचान खो कर एक नयी पहचान बनानी पड़ती है और इसी नाम से ग्राहकों से विदेशी  लहजे में बात करनी पड़ती है। पहले पहल तो यह काम अच्छा और रोचक लगता है परन्तु बाद में एकरसता के कारण बोरियत होने लगती है। इसके अलावा तुनक मिजाज ग्राहकों की डॉट सुनने के बाद मानसिक दबाव बना रहता है। इन्हें काम के बीच में बहुत कम समय का ब्रेक मिलता है। 

इसके साथ ही काम का बहुत अधिक दबाव भी लगातार बना रहता है। इस दबाब को कम करने के लिए वो सिगरेट और शराब का सेवन करने लगते हैं और इसके आदी हो जाते हैै। अथक मेहनत के बाद भी काम में तरक्की का बहुत ज्यादा मौका नही होता है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि अल्पआयु में ही अचानक इतना पैसा और आजादी भी मिल जाती है जिसका अपरिपक्व मन सही तरिके से इस्तेमाल नही कर पाता है।

जो युवा छोटे शहरों से यहां काम करने आते हैं वो इस तरह के स्वतंत्र माहौल में अपने को बैकवर्ड की तरह देखने लगते है और हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं।

इस सेक्टर के लोग पैसा, शान- शौकत  और आजादी तो पा जाते है पर भावनात्मक सहारा नही पाते है और बहुत सारी शारीरिक, मानसिक तनाव और बीमारीयों का शिकार  होते हैं। 
    


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